मैं काला हूं। काला ही सही।
तुम्हे कालो से नफरत क्यों।
रंग। का काला हूं पर मन का गोरा
तुम्हे रंगो से नफरत क्यों।
जिस गोरे रंग पर तुम इतराती।
उस गोरे रंग का रक्षक कोन।
बुरी नजरों से बचाने को।
तुम्हारी मां टिका जो लगाती।
उसी रंग से नफरत क्यों।
तुम्हारे बालों। का रंग भी काला
जिसे तुम इठलाती हुई संवारती।
तुम्हारे आंखो का काजल भी काला
जिसने तुम्हारी खूबसूरती बढ़ा दी।
उस रंग से तुम्हे नफरत क्यों।
हां मैं काला हूं। काला ही सही।
तुम्हे कालो से नफरत क्यों।
जिस रंग ने तुम्हरी काबिलियत बढ़ा दी
उस रंग से तुम्हें नफरत क्यों।
कवि नेनाराम सैनी।
9783450868