माँ तुम "सिल्क" साड़ी महँगी कह छोड़ती
महँगे कप मेहमानों की खातिर सहेजती
हम लतीफ़े बना बना तुम्हारी मितव्ययता के
तुमको ही हँसाते
त्यौहारों पर नही देखा कभी
सबके साथ फुर्सत में खुशियाँ मनाते
हमेशा रही तुम मशरूफ रसोई में
जाने क्या क्या बंदोबस्त करती
तब अक्सर सोचती थी मैं
तुम नही जानती हो जिंदगी का स्वाद लेना
लेकिन अब महसूस कर पाती हूँ
"ज़िम्मेदारियों " के सुराख से
चुप सरक जाती है तमाम मसखरी
कभी वक्त निकाल कर सँवरते नही देखा तुमको ,
मैं झुंझलाती थी सौ दफ़ा तुम्हारी
हड़बड़ी भरी गड़बड़ियों पर
कैसे गर्म कढ़ाही से चटका लेती हो
बुरे लगते है ये जले निशान हाथ पर ,
एड़ियां फट जाती है आपकी
कुछ ख्याल किया करो ,
सब्जी "चापर बोर्ड" पर नही काटती
उँगलियों पर चाकू की ये निशानियाँ
अच्छी नही लगती
बैंटेक्स मत पहना करो
शर्मिंदा करती तुम्हें तमाम लापरवाहियों पर
लेकिन अब खुद धुरी के केंद्र में खड़ी होने के बाद समझने लगी हूँ
औरत खो देती है सुध-बुध ,रूप, श्रृंगार, शौक और उम्र
"परिवार" को आत्मा में धारण करते करते ।
अब मैं जब गीले बालों से ही
रसोई में घुसती हूँ
तुम सी ही लगने लगती हूँ
भगवान को ताली बजा नींद से उठाती
तुम सी जागती हूँ
सारे पर्व रीति रिवाज़ो के प्रबंध करते करते ही जाने कब गुजर जाते
रसोई, छत, आँगन में फिरती और
दिन ढले थक कर डूबी डूबी तुम सी दिखती हूँ
आँखों से पानी आने तक हँसी नही मैं कब से ऐसा याद आए तो
तुम सी फीकी फीकी लगने लगती हूँ मैं माँ
कोई सहेली भी स्नेहिलता से भिगो दें जब मन को
लम्हा भर उसके प्रेम में भी तुम झलकती हो माँ
दूर होकर भी मैं कभी खुद में तो
कभी आत्मीय रिश्तों में तुमको टटोल ही लेती हूँ
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