ऐ सपनों न आंखों में आया करो
ग़रीबी में जी न जलाया करो ।
न ऐसे यूं हमको सताया करो
कभी सच में भी तशरीफ़ लाया करो ।
बुरी है गिराने की आदत तुम्हारी
तुम गिरतों को आकर उठाया करो ।
छत से सवेरे ये कहती है चिड़िया
कभी हमको भी दाना खिलाया करो ।
रूठे सनम को कैसे कैसे मनाया
कभी मां को भी आकर मनाया करो ।
मुहब्बत में दुनिया कहां याद *"सूरज"*
दरमियां दुनियादारी न लाया करो ।
सूरज प्रकाश