काल के कपाल पर दिख रहा भविष्य विकराल है,
टुकड़ों में बंटा समाज है और देश बदहाल है ।
जाती धर्म के कुचक्र में खुद को छल रहा ये लोकतंत्र,
वंशवाद के विषबेल से मूर्क्षित घायल बन गया मुर्खतन्त्र।
अतीत के डरवाने काले पन्नों से सदियों से खाये भयानक चोटों से ,
नहीं है तत्पर फिर भी आज हम सीखने को अपनी पिछले भूलों से।
भीख में अपना अधिकार पाकर ,करके चोरों का जय जयकार,
ऐसे होती खुश ये जनता जैसे किसी राजा की हो सरकार।