Hindi Quote in Shayri by Divya Sharma

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मैं उस युग में जाना चाहती हूँ

हुआ प्रथम अपराध जहाँ पर
सहा था अत्याचार जहाँ पर
उस युग को मिटाना चाहती हूँ।
जब हाथ उठे थे औरत पर
क्यों वह चुपचाप सह गई
उसकी इस गलती पर
औरत जाति अबला रह गई
तुने क्यों प्रतिकार किया ना
क्यों खामोश तू रह गई
जो गलती औरत ने की थी
उसे मिटाना चाहती हूं
मैं उस युग में जाना चाहती हूं।
कब मानव विभक्त हो गया
कहाँ से क्रुर यह धर्म हो गया
कब यह सभ्यता बनी
कब यह बस्ती बसी
इस सभ्यता और बस्ती में
इंसान बसाना चाहती हूं
मैं उस युग जाना चाहती हूँ।
निज स्वार्थ सिद्धि के लिए
रोज क्यों प्रपंच रचे
क्यों हर योजना में
बस औरत के वस्त्र ही फटे
उस जालिम इंसान की
मैं भुजा उखाड़ना चाहती हूं
मैं उस युग में जाना चाहती हूं।
बलशाली तुम भी तो थी
फिर क्यों बलहीन तुम हो गई
क्यों खुद की इच्छा को छोड़
अपने आँसू पी गई।
इस वर्तमान की दुश्वारियों को
तुमने पूर्व में आगाज किया
छोड़ कर अपनी भुजाओं के बल को
हर औरत के साथ विश्वासघात किया
जब पहली बार आग में
औरत ने स्नान किया
मैं जलती हुई ज्वालाओं को
शीतल जल बनाना चाहती हूँ
मैं उस युग में जाना चाहती हूँ।
जब कन्या को बोझ कहा
जब कोख ने अत्याचार सहा
जिस जिह्वा से निकली थी गाली
उस जिह्वा को काट देना चाहती हूँ।
इस सृष्टि के इस सृजन में
तुम ही तो कारक हो
तुमने क्यों औरत होकर
खुद अपना संहार किया
उस नृशंसता को
इस युग से हटाना चाहती हूं
मैं उस युग में जाना चाहती हूं।
बना भाग्य आँसुओं को
तुमनें खुद का अपमान किया
औरत को उसकी शक्ति का
पाठ पढाना चाहती हूं
लिखे हुए जो त्याग के किस्से
मैं उन्हें मिटाना चाहती हूँ
बना मजबूत स्तंभ औरत को
वर्तमान में लाना चाहती हूँ
मैं उस युग में जाना चाहती हूं।
कर रही हूं प्रयास अथक मैं
सबको बतलाना चाहती हूँ
खोया जो सम्मान औरत ने
उसे वापस लाना चाहती हूं
मैं उस युग में जाना चाहती हूँ।

दिव्या राकेश शर्मा।

Hindi Shayri by Divya Sharma : 111066802
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