यादें:
यादों को लेकर अभी चल ही रहा हूँ
भारी नहीं हैं पर बहुत हल्की भी नहीं हैं,
खो भी गयी हैं पर खोजी भी गयी हैं
जहाँ पर खड़ा हूँ, वहाँ पर नहीं हैं,
पर जगमगाते हुए समय पर दिखी हैं
किसकी कितनी बाँटें,बाँटो तो नहीं बँटती,
कठोरता नहीं है, सब कोमल हो चुकी हैं
यादों को लेकर अभी चल ही रहा हूँ।
वह साफ गुनगुनी धूप, वह क्षण भर का साथ
इतने लम्बे सफर का साथी बन गया है,
कहो तो मिटा दूँ पर मिटता नहीं है
न चाहते भी मन में रह गया है।
ये रोगियों की पंक्ति, ये रोगों का जमघट
यादों में घुसपैठ लगाये हुए हैं,
सीमा पर तैनात यादों के सिपाही
डटकर खड़े सामना कर रहे हैं,
ये टोकरी में नहीं कि किसी को दे दूँ
मेरी ईहा को जगाये हुए हैं,
यादों को लेकर अभी चल ही रहा हूँ।
†*महेश रौतेला