बंद आँखों ने तो सजाएं हैं सपने , बहुत
बंद आँखों ने तो सजाएं हैं सपने , बहुत
आँख जब खुली हो तो सपनों में आना कभी .
मदभरे उजालों में तो गुनगुनाते हैं गीत ये सभी
सांझ जब ढल जाय तो गीत मेरे गुनगुनाना कभी .
हाथों की मजबूती को तो पकड़ा है सब मेरे दोस्तों ने
थक जाएँ हांथ जब मेरे तो उनको तुम सहलाना कभी .
जिंदगी की सुबह में लगाते हैं गले सब सलीके से
ढल गया हो दिन जब तो साथ मेरे आना कभी .
भागते हुए रास्तों पर तो मिलते हैं हमसफ़र बहुत
बंद हो जाएँ गलियां जब तो आकर उन्हें खुलवाना कभी .
सुरेंद्र कुमार अरोड़ा ,
डी - 184 , श्याम पार्क एक्सटेंशन , साहिबाबाद - 201005 ( उ . प्र ) ,
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