निगाहों से निगाहों में उतरने को जी चाहता है
निगाहों निगाहों से निगाहों में उतरने को जी चाहता है
प्यार के दो गीत गुनगुनाने को जी चाहता है
रूठे हुए अपने को मनाने को जी चाहता है
मान जाये वो तो खुद रूठ जाने को जी चाहता है
अभी तो जिंदगी का फलसफा पूरा है बाकी
कुछ कहने , कुछ सुनने को जी चाहता है
निगाहों से निगाहों में उतरने को जी चाहता है
बाहों में उनकी समा जाने को जी चाहता है
काश कि दिल की धड़कनो को सुन पाते वो
साँसों में उनकी उतर जाने को जी चाहता है
मिले जो साथ उनका तो भंवरों सा गुनगुनाने को जी चाहता है
मिल जाएँ झीलें जो उनकी तो आँखों में उतरने को जी चाहता है
जब से देखा है कली सा उनका चेहरा
फूलों की तरह खिलखिलाने को जी चाहता है
होता नहीं है इन्तजार अब और जरा भी
उन पर जिंदगी को निसार करने को जी चाहता है .
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा