मैंने एक दिन झील से कहा-
मैं उब चुका हूँ
तुम्हारी कच-कच से,
इन हल्के-फुल्के थपेड़ों से,
तुम्हारे गदले रूप-रंग से।
मैंने पहाड़ से कहा-
मैं उब चुका हूँ
तुम्हारी नंगी ऊँचाई से।
मैंने मनुष्य से कहा-
मैं उब चुका हूँ
तुम्हारी नंगी जुबान से,
फिर आगे कहा-
कुछ शब्दों को उखाड़ दो, खर- पतवार की तरह,
कुछ शब्दों को काट दो, झाड़ियों की तरह।
फिर लम्बे सन्नाटे के बाद सुनायी दिया,
यही उब है जो नयी खोज कराती है,
नयी सरकार बनाती है।
***महेश