#शायरी प्रतियोगिता
वो कहते हैं...हजारों सैनिक
न रोक पाए, जिस आतंकवाद को...
फिर साहित्यकारों तुम क्या करोगे?
मैं कहती हूं........
होंसला तोड़ने वालों का अब मुझको
जरा भी ग़म नहीं होता........
कलम का वार भी,
किसी तलवार से कम नहीं होता।
जलाकर इक आशियाना दीपक!
खुद को सूरज समझता है ....
कभी भी असत्य,
सत्य के यूं सम नहीं होता.....
और कर सकता बराबरी जो
तुच्छ दीपक सूरज की......
इक हवा के झोंके से डगमगाकर
यूं नम नहीं होता....
मैं फिर कहती हूं!
कलम का वार भी,
किसी तलवार से कम नहीं होता।।
सीमा शिवहरे "सुमन"