इंसान बनके रहने दो
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इंसान को इंसान बनके रहने दो
इंसान में बस, इंसान ही पाया जाये।
क्यों खड़ा कर रखा है नफ़रतों का हिमालय
आओ, रिश्तों में जमी बर्फ़ को पिघलाया जाये।
उड़ते पंछी और हवाओं ने कहाँ मानी हैं सरहदें
क्यों न, इन इंसानी सरहदों को मिटाया जाये।
क़ौम का इतिहास दफ़्न है क़िताबों में
नफ़रत को अब,न नफ़रत से मिटाया जाये।
तुमने पढ़ी होंगी लाखों क़िताबें
ढाई अक्षर में इस संसार को बचाया जाये।
हर एक के दिल में इंसानियत महफ़ूज रहे
इंसान को बस, इंसान ही पुकारा जाये।
- विजयानन्द विजय
आनंद निकेत
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