कितना सुकून दे गया था ना बाजार की गलियों में वो मेरा, तुम्हारा हाथ थाम कर चलना। याद है ना कितना बेफिक्र होकर घूमे थे। सच में बहुत याद आ रहे हैं वो पल, क्योंकि आज फिर उन गलियों से गुजर रही हूँ ना। तुम कहो तो फिर से घूम लेते हैं ना, फिर कहाँ ऐसी सर्दियां आयेंगी। पता तो है ना तुम्हें कि मुझे अकेले घूमना पसंद नहीं है।... कुछ ऐसा ही दीपा बातें कर रही थी। जैसे कोई हो उसके कमरे में। दरवाजा खोलने पर पता चला, वहाँ कोई है ही नहीं। फिर किससे बातें कर रही थी, माजरा कुछ समझ ना आया किसी को, पर दीपा मन ही मन मुस्कुरा रही थी, शायद गहरी सोच में थी। उसे अभी भी नहीं पता था कि किसी ने उसके कमरे का दरवाजा खोला है।