#काव्य -ढोल में पोल
एक रात अपने स्वप्न से मैं स्वर्ग में गया ।
एक सन्त ने वहाँ भी मुझसे जाति पूँछ ली ।।
मैंने कहा प्रभु हिअयूँ का जाति अब चली ।
बोले किधर है भेजना कइसे पता चली ।।
मैंने कहा अन्तर्गयाई चेहरे से भाँप लो ।
क्रोधित हुए कहने लगे बत्तीसी झांप लो ।।
जाति धर्म बोल दो जल्दी से वत्स तुम ।
वरना यहाँ से खिसको अपना रस्ता नाप लो ।।
मैंने कहा बेधर्म हूँ , मैं बेजात हूँ प्रभू ।
बोले अगर बेजात हो धरती पे ही रहो ।।
धरती पे जाके नास्तिक वहीं पे रोक दो ।
जो जाति-धर्म कर रहें सब स्वर्ग भेज दो ।।
जितने हैं नास्तिक यहाँ उधम मचा रहे ।
पीकरके सारे देवता हैं गम भुला रहे ।।
मैंने कहा कि नास्तिक प्रमाण खोजते ।
साधू हमारे देश में झगड़ा करा रहे ।।
विनती किया भेजो नही मुझे प्रभू धरा ।
वहाँ तो राजनीति में बवाल है धरा ।।
बोले यहाँ भी राजनीति डाँवाँडोल है ।
ढोल वही बज रही जिसमें की पोल है ।।
-पन्ना की कलम से