चाय पर चलोगी क्या?
साधारण सा सवाल था मेरा, पर एक तरह की अंतहीन चेष्टा और कहे तो एक बार और हा होने की लालसा में की गई चेष्टा।उन्होंने देखा घूर कर फिर से और कहा, फिर कर दी ना वही बात हमेशा की तरह और तुम्हे पता है मै ना ही कहूंगी।आखिर तुम थकते नहीं हो मेरी ना सुन कर।
मै बस बिहवल नजरो से देखता रह गया।
मन में आया कि बोल दू “वो आशिक़ ही क्या जो थक जाए?”पर चुप रहा ये सोचकर कहीं मेरे प्रयास की सीमा और लंबी ना हो जाए इन कटु वचनों से।