किसीको तो युही मिल गई मुहब्बत बिन दुआओ के,
और हम इतनी इबादत करके भी आबाद रहे,
क्या कसर थी हमारी भी दुआओ में
जो तूने सुनकर भी अनजान किया,
एक महबूब तो माँगा था,
उसमे क्या गुनाह था,
हम भी तेरे दर पर आये,
न जाने कितने सजदे किये,
फिर भी मायूसी,
कभी तो जोली भरदे मेरी,
कभी तो ख्वाइश पूरी करदे मेरी,
यु खाली हाथ जाना अच्छा नहीं लगता,
पल पल यु मरना क्या तुजे सच्चा नहीं लगता ?
क्या तूने किस्मत में सिर्फ लिखा रोना,
या फिर भूल गया लिखना किसीका होना,
बस अबतो थोडा महेरबान बनजा,
किसीको तो युही मिल गई मुहब्बत बिन दुआओ के,
और हम इतनी इबादत करके भी आबाद रहे...