मनोमंथन :
हल्का हल्का सा दिल मे एह्सास क्यूँ है ..
बुझा बुझा मन और भारी सांस क्यूँ है ?
यूं तो कुछ भी कमी नही है जीन्दगी मे,
फिर भी पता नही दिल थोडा सा उदास क्यूँ है ?
सो के उठना ,उठ के दौडना , दौड के भागना
क्या पता जीन्दगी कि रफ्तार तेज़ क्यूँ है ?
पल भर भी ना रुक पाउ कभी खुद के लिये
दौड रही है बस जीन्दगी , शांति से परहेज क्यूँ है ?
ख़डे पांव काम करु , फिर भी बोस की डपट खाउ ,
उस के टार्गेट पुरे करने का, हम ही शिकार क्यूँ है ?
उन से ना कुछ कह पाउ मैं , मन ही मन झुलस जाउ मैं
घर जा के सब पे उबल जाउ मैं , सहमा सा परिवार क्यूँ है?
सुबह कि गरम चाय मेज पे हमेशा ठन्डी हो जाये
मुझे देख तरसता घर का झूला और अखबार क्यूँ है?
कब देखा मैने सुबह का सूरज, कब देखी ढलती श्याम
ओफिस मे ही दिन रात , ओफिस मे ही संसार क्यूँ है ?
सालो गुजरे , उमर बीती , नौकरी के माया जाल मे ,
ठोकर लगाउ नौकरी को ??? ये सोचना भी पाप क्यूँ है !!!
कब मनाउंगी खुशिया , कब होगा हर लम्हा हसीन
ज़ीयुंगी जरुर अपने लिये एक दिन, ऐसा विश्वास क्यूँ है ?