गज़ल
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होता है एक की रोशनी से रोशन दूजा
आफ़ताब और माहताब की यारी भी क्या खूब है ।
घूमती रहती है शाम औ' सहर हर पहर बेरूके
ऐ धरती तेरी यायावरी भी क्या खूब है ।
मारे हाथ-पांव बची डूबते डूबते बमुश्किल
उन चश्म ए-दरिया की उमुक़ भी क्या खूब है ।
भोली आंखे मासूम चेहरा अनसुलझे सवाल
मां के दामन को मिले ये जवाहरात भी क्या खूब है ।
लगे हैं पहिये और चलता भी नहीं
वो सूरज का मंदिर भी क्या खूब है ।
न कहीं जाने की तमन्ना न पहुंचने का इंतजार
हमारे दिल की हालत भी क्या खूब है ।
जय लंकेश ?