मेरी नवीनतम हास्य व्यंग्य रचना "जो चोर थे" पेश कर रहा हूँ । राजनीतिक दृष्टि से शायद कुछ मित्रों को कटु व्यंग लगे परन्तु साहित्यक दृष्टिकोण से सत्यता को चित्रित करने का किया है । उम्मीद करता हूँ पसन्द आएगी ।
जो चोर थे
जो चोर थे वही तो चौकीदार हो गए ।
जो देश लूटते थे वो सरकार हो गए ।।
इन्शान को इन्शान से जिसने लड़ाया है ।
वही तो एकता के ठेकेदार हो गए ।
जो चोर थे वही तो ……………।
वो बन्दर हमारे हिस्से को भी साफ करेंगें ।
हम बिल्लियों की तरह उनको माफ करेंगें ।।
हमने ही उनके हाथ में बन्दूक थमाई ।
लो फिर से पीठ पीछे से ही वार हो गए ।।
जो चोर थे वही तो ……………।
जो आठवीं हैं फेल खूब सैर करेंगें ।
हम पढ़-लिख के होटल में उनकी खैर करेंगें ।।
हमनें पुरानी साइकिलों से रैलियाँ करीं ।
ओ तो हवाई यन्त्र पर सवार हो गए ।।
जो चोर थे वही तो ……………।
हमको हमारे वोट का हिसाब चाहिए ।
पूरा न हो सका वो फिर से ख़्वाब चाहिए ।।
नेता हमें अम्बेडकर , सुभाष चाहिए ।
लो फिर से वही उल्लू असरदार हो गए ।।
जो चोर थे वही तो ……………।
हम उल्लुओं की भीड़ से उल्लू ही चुनेंगें ।
फिर जाति धर्म देख अपने वोट गिनेंगे ।।
हम अपने काले नोटों को सफेद कर रहे ।
ले करके सारा माल ओ फरार हो गए ।।
जो चोर थे वही तो ……………।
हिन्दू न मुसलमान ये झगड़ा है वोट का ।
न शिक्ख न पठान ये रगड़ा है वोट का ।।
ओ शीट जीतने के लिए फूट डालते ।
जो वोट डालते हैं ओ बेकार हो गए ।।
जो चोर थे वही तो ……………।
--पन्ना