लघुकथा-" दीपावली का बोनस"
घरेलू नौकरानी सुखिया दीपावली पर बोनस लेने की बात पर अड़ी थी। मिसेज शर्मा कह रहीं थीं -" भई तू क्या कोई सरकारी कर्मचारी है जो तुझे बोनस मिलेगा?अरे, मेँ तुझे पूरे पंद्रह सौ रुपए महीना देती हूँ और बोनस क्यों दूँ?"
सुखिया कह रही थी -" मालकिन आप ही तो हमारी सरकार हैं। सरकार तो त्योहारों पर बोनस देती हैं न? अगर आप इस दीवाली बोनस पर कुछ पैसे दे देंगी तो मैं अपनी मुनिया को इस बार की दीपावली पर एक बढ़िया सी फ्रॉक गिफ्ट देना चाहती हूँ।क्या है उसकी फ्रॉक फट गई है ।कई दिनों से नई फ्रॉक के लिए वह जिद्द कर रही है। बेटा भी अपने जन्म दिन पर बेट बॉल लेने की जिद्द कर रहा था पर उसे दे नहीं पाई।"
यह कहते हुये सुखिया की आँखे गीली हो गई।
मिसेज शर्मा ने उसकी बातों को अनसुना करते हुए उपेक्षा से कहा," देख हर दीपावली तुझे साड़ी तो देती ही हूँ। अब और क्या दूँ ? चल ठीक है जाकर मुन्ने को नहला ।" यह कहती हुई वह आफिस जाने के लिए तैयार होने लगी।
जैसे ही वह आफिस पहुंची।पता चला कि सारे कर्मचारियों की एक अर्जेन्ट बैठक है। बैठक में बोनस बढ़ाने के लिए हड़ताल पर जाने का निर्णय लिया गया।
अभी वह आफिस से लौट रही थी कि उसकी सहेली का फोन आ गया। मिसेज शर्मा खुश होकर बता रही थी कि उनके आफिस के सारे कर्मचारी कल से हड़ताल पर जा रहे हैं। अब तो बोनस बढ़ना तय है। उधर मोबाईल पर सहेली उनसे कह रही थी-", वाह जी तुम सरकारी कर्मचारियों की तो चांदी ही चांदी है। वेतन और बोनस दोनों की बढ़ोतरी हो रही है। बधाई हो । अब तो जरूर तुम दीपावली पर सोने के जेवर खरीद लोगी।"
तभी अचानक उसे अपनी नौकरानी की याद आ गई।उसे उसका रोता हुआ चेहरा आँखों के सामने दिखने लगा। वे कल्पना करने लगी कि अगर उसकी नौकरानी बोनस की मांग के लिए हड़ताल पर चली जाए तो उसका क्या होगा? उनकी नौकरानी सुबह सात बजे से रात्रि तक उसका घर और बच्चा दोनों संभालती है। वह न आये तो यह पचास हजार की नौकरी कभी नहीं कर सकती। यह सोचते हुये उसका मन अचानक अपनी नौकरानी के प्रति सवेंदना से भर उठा।
उसने जल्दी से अपनी स्कूटी स्टार्ट की और बाजार की ओर चली गई। उसने एक सुंदर सा फ्रॉक लिया। एक बढ़िया सा बेट बॉल लिया और मिठाई का डिब्बा लिए वह सुखिया को देने प्रसन्न मन से चली गई।
डॉ. शैल चन्द्रा
रावण भाठा, नगरी
धमतरी , छत्तीसगढ़
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