लघु कथा
*सज़ा*
सन्नाटे से गूँजती कमरे की चार दिवारी के कोने में पड़े पलंग पर....अस्तव्यस्त स्थिति में बैठी वह देह... हाँ देह... सिर्फ देह ही तो है वह.
रेगिस्तान सी शुष्क , शून्य में तकती आँखे चलचित्र की भाँति आते जाते दृश्यों को समायोजित करने की नाक़ाम कोशिश में मानो पलके विहीन हो गई है.
मधुर संगीत पर थिरकते कदम और वितृष्णा से भरा मन....कितना विरोधाभास है न.जाने क्यों यही उसकी नियति है . जिंदगी कई बार ऐसे मोड़ भी ले आती है जिसपर चाहे अनचाहे कदम बढ़ ही जाते है.
पिता विहीन परिवार....माँ और छोटे भाई की जिम्मेदारी निभाने ....रितिका जब घर से निकली तो पाया कि हर रास्ता उसके जिस्म से होकर ही गुजरता हैं.
लोलुप्त निगाहें और छू लेने की चाहत में बढ़ते
हाथों के बीच, जीवन जीने के लिए संघर्ष करती
रितिका ज़िल्लत भरे मार्ग की और धकेल दी गई.
सब कुछ सह कर, संघर्ष कर इन रास्तो से गुजरते हुए परिवार को सँभालने की जद्दोजहद ने उसे बाज़ार में लाकर खड़ा कर दिया , वहाँ से सब कुछ संभल जाने पर वापस लौट जाने की उम्मीद लगाए बैठी थी वो.
वही रितिका आज मेन्टल हॉस्पिटल के कमरे में तिरस्कृत ,बहिष्कृत, नितांत अकेली, अनेक प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ती अपने जीवन समर्पण की सजा पा रही है .
शिरीन भावसार
इन्दौर (म. प्र.)
24.10.2018