कविता-"माँ"
माँ आँचल में बांध कर रखती है प्यार।
कभी मनुहार कभी लिए उपहार।
वात्सल्य से दमकता माँ का चेहरा।
गृहस्थी कि धूप सहतीं वे साँझ- सबेरा।
माँ होती धरती,सब कुछ सहती ।
अपने मुख से कभी न कुछ कहती।
माँ है सरिता सी शीतल ,पावन निर्मल गंगा जल।
ममता की असीम स्त्रोत, तुहिन कण सी निर्मल कोमल।
माँ,दरख़्त की ठंडी छाया।
माँ के आंचल में पूरा विश्व समाया।
माँ है विस्तृत आसमां।
इस जग में पूजनीय वंदनीय माँ।
डॉ. शैल चन्द्रा
रावण भाठा, नगरी
जिला - धमतरी
छत्तीसगढ़