लघुकथा---
"अनुशासित"
मिसेज आहूजा के घर किटी पार्टी चल रही थी। डायनिंग टेबल देशी - विदेशी पकवानों से सुसज्जित था।तभी किसी की नजर सोफे के नीचे दुबके कुत्ते पर पड़ी। उसने कहा," अरे, यह कुत्ता यहां सोफे के नीचे पड़ा हुआ क्या कर रहा है?"
उत्तर में मिसेज आहूजा ने कहा,-"अरे, डरो नहीं। यह हमारा डॉगी है जैकी। यह उसकी मनपसंद जगह है।"
क्या कभी यह डायनिंग टेबल पर खाने के लिए झपटता है?" मिसेज सोनी ने पूछा।
" नहीं कभी नहीं।यह बड़ा अनुशासित है। यह मेरी हर बात मानता है।मेरी हर बात समझता है।मैंने इसे कड़े अनुशासन में रखा है।" यह कहते हुए मिसेज आहूजा स्वयं को गौरवान्वित महसूस करने लगी।
तत्काल उन्होंने अपने कुत्ते को आदेशित किया--"जैकी अपने कमरे में जाओ।"
यह सुनते ही कुत्ता तुरन्त वहां से उठकर दूसरे कमरे में चला गया। कुत्ते के पीछे- पीछे मिसेज आहूजा और उनकी सहेलियां भी पहुँच गईं।
मिसेज आहूजा ने पुनः कुत्ते को आज्ञा दी-" चलो जैकी अपने बॉल से खेलो।"
कुत्ता मालकिन की बात मानकर तुरन्त बॉल को इधर-उधर अपने पंजों से लुढ़काने लगा।
मिसेज आहूजा की सहेलियां उनकी प्रशंसा के पुल बांधने लगीं।
एक कह रही थी-"वाह, मिसेज आहूजा, आपको तो मान गए।आपने तो वाकई अपने कुत्ते तक को अनुशासन में रखा हुआ है। बहुत खूब ।"
तभी मिसेज आहूजा की किशोर बेटी को उनका ड्राइवर कंधे के सहारे लिए कमरे में दाखिल हुआ।
" क्या हुआ बेबी को?" मिसेज आहूजा ने चिंतित स्वर में पूछा।
"कुछ नहीं मालकिन, आज बेबी ने फिर से पी रखी है।" ड्राइवर ने जवाब दिया।
यह सुनते ही मिसेज आहूजा आपे से बाहर हो गईं।उन्होंने बेबी को झिंझोड़ते हुए कहा,-"कितनी बार तुझसे कहा है कि कॉलेज जाकर पढ़ाई किया करो पर तुम तो पब क्लब में जाकर रोज -रोज शराब पीकर चली आती हो। मेरी बात आखिर तुम कब मानोगी?"
उत्तर में लड़खड़ाती आवाज में बेबी कह रही थी-"क्यों मानूँ मेँ आपकी बात?भाई आपकी बात कहाँ मानता है?वो कई-कई दिन घर भी नहीं आता है पर आप उसे क्यों कुछ नहीं कहतीं?"
यह सुनकर मिसेज आहूजा की सहेलियां कुत्ते की ओर देखने लगीं।
डॉ. शैल चन्द्रा
रावण भाठा, नगरी
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छत्तीसगढ़
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