वो बिन आवाज जुल्म ढाते रहे ,और हम बेजुबान बनसब सहते रहे। आंसू तो निकलते थे इन आंखों से मगर, सिसकियां को सबसे छुपाते रहे।। वह बिन आवाज जुल्म ढाते रहे ।रोते थे कभी हमारी खातिर वह आज हम को रुलाते रहे। जो तड़पेथे कभी हमारी खातिर, वो आज हम को तड़पाते रहे ।।वह बिन आवाज जुल्म ढाते रहे हम तोड़ सके इन जंजालों को कोशिश की थी मगर ,प्यार की खातिर मजबूर होते रहे। वह दुश्मन न थे फिर भी सितम ढाते रहे। कितना दर्द है दिल में हम सब से छुपाते रहे ।।वो बिनआवाज जुल्म ढाते रहे बर्बाद करना था तो किसी और तरह करते जिंदगी बनकर जिंदगी बर्बाद करते रहे। हम बेजुबान बन सब सहते रहे ।वो बिन आवाज जुल्म ढाते रहे।।???...✍️ विनीता