'एक इन्सान बन जाऊ'
शिकायते तो बहोत थी ए जिंदगी तुजसे,
पर खुदसे खुदको यु संभाल लिया मैने ।
देखा जब रोटी के लिए तड़पते जिस्म को,
निवाला अपना उस भूख को दे दिया मैने।
उतनी अमीरात मेरी कहा के खुदा बन जाऊ,
बन शकु तो चाहत थी एक इन्सान बन जाऊ।
झुलस रहा कोई दर्द में अगर तो दवा बन जाऊ,
लूंटा दू सब उसपे, चाहे फिर खुद खर्च हो जाऊ।
जाना है अभी अभी कितनी खूबसूरत हे जिंदगी,
हर पहलु जीनेका जैसे तरीका खोज लिया मैने।
वजह मिल गई, दिशा मिल गई जीनेकी एक नई,
कोंश रहा था जिसे, उसिसे महोबत करली मैने।
मिलन लाड, वलसाड - सूरत.