कविता - #वो_तो_एक_ही_थे ।
अपने बच्चों की खातिर हर सुख का त्याग करे,वो *माँ* होती है..
पर जो पराये बच्चों को भी अपनी ममता की छाँव दे ,वो सिर्फ *देवी माँ* होती है...
मुमकिन है आज ये भी की हर घर में आपको *युद्धिष्ठिर* मिल जाए,
पर सत्य के लिए अपना सब कुछ लुटा देने वाले वो *राजा हरिश्चंद्र * तो एक ही थे...
मुमकिन है ये भी हर बेटा *श्रवण कुमार* हो जाए,
पर पित्रआज्ञा मान सब त्याग वन जाने वाले वो* राम* तो एक ही थे..
मुमकिन हे ये भी ,आज हर मित्र *कृष्ण* हो जाए,
पर परिणाम जानते हुए भी मित्र ऋण की खातिर प्राण न्योछावर कर दे वो *कर्ण* तो एक ही थे...
मुमकिन है ये भी आज हर प्रेम दीवानी *राधा* हो जाए,
पर पीकर जहर का प्याला प्रीत की रीत निभाने वाली वो *मीरा* तो एक ही है...
Atul Kumar Sharma