#काव्योत्सव , ॥ प्यार कहाँ है तू ॥
प्यार की एक बूंद को
हम तरसा किए ,
खुदा से बहुत मिन्नतें भी किए ।
घर में ढूंढा उसे ,
ढूंढा बाजारो में ,
नद , नदियां, वन , पर्वत, हिमालय मे भी ,
तुममें ,उसमें भी देखा
पर प्यार मुझे कहीं मिला ही नहीं ?
मन बोझल ,दुखी ,बेकरार हो गया ।
प्यार की एक कसक ,
मन में खटकती रही ,
दिल हिरनी सा घायल
तड़पता रहा ,
मन ही मन दिल को सहलाने लगी ,
प्यार के अमृत से खुद को नहलाने लगी ।
दिल को ठंडक मिली ,
करार आ गया ।
खुद को ही खुद से ,
किया प्यार ,
जीवन में फिर बहार आ गया ।