#काव्योत्सव
#डर
तुझे बड़ा होते देख मे डर जाती,
कभी बच्चा चोर डराते,
कभी चेनल पडोसी दिखलाती,
आसपडोस मे भैजुं कैसे सोच के में घबराती,
नन्ही तेरी आँखो में प्रश्न से चूप हो जाती,
तुझे बडा होते देख मे डर जाती।
स्कूल भेजते बस ड्राइवर को आंखों से नाप लेती,
सूचनाओंकी वर्षा उस संग तुजपे भी कर देती,
तेरी बोरियत जान के भी चूप ना मे रह पाती,
तुझे बडा होते देख मे डर जाती।
कभी सड़क किनारे पे, जिब्राक्रोसींग के धारो पे,
दूसरों की गलती पे भी तुझको डांट लगाती,
दिनभर शीख सून के, तेरा गुस्सा भी जान जाती, पर
तुझे बडा होते देख मे डर जाती।
बेटी नहीं मेरा बेटा है क्या ईससे मन बहलाती?
ईस विकृत समाज से कैसे बचाऊँ? नुस्खे मे आजमाती,
तुझे थका सा देख कर भी गलती पे बरस जाती,
तुझे बडा होते देख मे डर जाती।
हर औरत का सम्मान करे तु, ऐसा बस सीखाती,
फिर टी.वी पे सज्जनों की हत्या देख के कांप जाती,
तेरे बार बार केहने पर भी, दूसरों में मत पड ये सुनाती,
तुझे बडा होते देख मे डर जाती।
जिम्मेदारी तु मेरी, तु प्राण भी है,
बनाना तुझे अच्छा इन्सान भी है, कहके में इतराती,
पर अंदर से समाज के वैशी रूप से सहम सी जाती,
दोगली सी लगती खुद को भी, फिर भी तुझे सीखाती, क्योंकि
तुझे बडा होते देख 'इस दुनिया मे' में डर जाती।
-परहेज