#kavyotsav
आत्मसम्मान
सात वचन में ऐसा क्यों न था कोई वचन...
जो कहता.. आत्मसम्मान है बचाना हर पल , हर क्षण ,
देख रहे थे चाँद तारे , बने थे जो फेरों के साक्षी...
हवनकुंड में आत्मसम्मान की भी सुलग रही थी एक लकड़ी ,
फेरों के हर अगले पग में , हर रस्म में आत्मसम्मान की भी आहुति थी ....
बाबुल का अंगना ही नही आत्मसम्मान की डोर भी छूट रही थी ,
बिखेरे थे जो दाने तुमने खील के माँ की झोली में... कुछ दाने आत्म सम्मान के भी लुट गए थे उन्ही में ,
विदाई में जब माँ तुमसे गले लग कर रोई ... दे रही थी आत्मसम्मान बचाने की मूक दुहाई ,
खुश रहे... तू आबाद रहे , तेरे जीवन में हरियाली रहे
क्यों न एक बार कह पायी...? तू आत्मसम्मान से रहे ,
खुद उसने भी ये भुगता था सब...अब बेटी के जीवन का भी बन जायेगा वही सबब ,
फिर भी दिल मे थी एक आस... अपने संस्कारों पर था विश्वास ,
जैसे मैंने दी तिलांजलि अपने आत्मसम्मान की...बेटी को न सब सहना पड़े यही उसकी तमन्ना थी ,
पर लड़कीं जब भी अच्छी बहू बनेगी... आत्मसम्मान की बलि तो उसके जरूर चढ़ेगी ,
जो इसके खिलाफ हो.. बग़ावती है , नही तो बहू सती साध्वी है ।।
©नेहाभारद्वाज