#Kavyotsav इक चप्पल
शेष पंक्तियाँ
मेरी प्यारी गुड़ियां रानी, देख तो!
मैं भी नंगे पैरों चलती हूँ।
मैं भी चाहूँ, नाज़ो से पालू तुमको,
तू भी खेले, झूला झूले,
तू भी पढ़े, साहब बने।
पर, लगता है, इस महँगाई और कम पगार में,
मैं तेरे आँसू चाहकर भी नहीं पोछ पाऊँगी।
(बिटिया मासूमियत से) माँ! ये सरकार कौन होती है?
सब कहते हैं इसने महँगाई बहुत बढ़ाई है,
क्या अगले महीने सरकार मर जाएगी?
येssss येsssss तब पाँव मेरे चप्पल होंगे।
पाँव तुम्हारे चप्पल होंगे।
मैं भी खेलूँगी तुम भी खेलना।
मैं भी पढूँगी तुम भी पढ़ना।
पास हमारे घर होगा,
तब तुम भी हँसना मेरे साथ।
जाती हूँ मैं काम पर माँ।
शंकर सिंह ''सेन निलय"
लखनऊ