#Kavyotsav (भावनाए)
ऐ उड़ते बाँदलों..
ऐ उड़ते बाँदलों..रुको जरा मैं भी तो साथ चलु..
धिरे धिरे होले होले..उन पहाडोंको छु के चलु..
ऐ उड़ते बाँदलों..रुको जरा मैं भी तो साथ चलु..
थंडी सर्दी में मस्त लपेटकर सोते उन पत्तोंको जगाते चलु
अपनी मधुर आवाजसे सबको मधहोश करनेवाली
उस कोयल के सुरोंको जरा छेडते चलु..
ऐ उड़ते बाँदलों..रुको जरा मैं भी तो साथ चलु..
दिन ढल रहा है..कही सुरज रुठ ना जाए
इसिलिए जाते जाते..कुछ किरणें बिखेरते चलु
रात है उगनेवाली पर चाँद नजर नही आता
उसे ढुँढने वासते जरा चाँदनीसे सिफारिश करते चलु
ऐ उड़ते बाँदलों..रुको जरा मैं भी तो साथ चलु..
फिरसे दोहराना है यह रंगीन सफर
चलो उसके वासते फिरसे सुबह की और चलु
ऐ उड़ते बाँदलों..रुको जरा मैं भी तो साथ चलु..
धिरे धिरे होले होले..उन पहाडोंको छु के चलु..
- साधना वालचंद कस्पटे ©
( मै पंछी होती तो प्रकृती के प्रती मेरी भावनाए ए होती )