आधे हैं ख्वाब आधा सा आसमान
आधे से हैं अरमान आधे ही जीने के सामान
रे मन तू क्यू नही समझता है
रे मन तू क्यू बिना बात ही भटकता है
मन के मोह को बंधनो मे बांध के रखता है
और आजाद परिंदों सा उड़ना चाहता है
रे मन तू क्यू नही समझता है
यहां ऐसा ही होता है
आधे हैं ख्वाब आधा सा आसमान
आधे से हैं अरमान आधे ही जीने के सामान