सीधे रास्ते थे मेरे,
चलता जा रहा था अपनी राह पकड़ कर,
पीछे से किसी ने मधुर आवाज लगाई,
बाबूजी मीठे जल पी लो,
थक गए होगे,
थोड़ा प्यार का ठंडक भी ले लो,
फिर चले जाना।
अब,
आजतक अपना रास्ता ढूंढ रहा हूं,
इतनी ठंडक मिली,
कि खुद की आग बुझ गई,
कब,
दूसरे के प्रकाश का मोहताज हो गया,
खुद के रास्ते खोजने में,
इस आश में,
शायद सफल हो जाऊ कभी।
#इश्क़ की ठंडक
-©Krishna Katyayan 2018