कुछ पुराने अल्फ़ाज़
उम्र बीती जा रही है इंतजारे प्यार में,
कब तक युु तनहा जिंदगी जिया करेंगे,
कोई मुक्कमल जहा बनाया होगा
शायद उस उपरवालेने हमारे लिए भी
जहा बैठ कर हम भी चार बाते प्यार की करे ?
ये तन्हाई तो अब रोज डसती है,
कतरा कतरा करके लहू हमारा जलाती है,
इस भीड़ भरी दुनिया में बेगाने से फिरा करते है,
कोई उम्मीद नहीं, कोई आश नहीं,
फिर भी जीना जरुरी क्यों बन रहा है ?
ए खुदा, ए ईश्वर...
कोई तो भेज ऐसा जो हमारे दर्द में
उतना ही हिस्सेदार बने,
हमारे हाथो को थाम कर,
कुछ कदम साथ चले,
कब तक यु जूठी उम्मीदों के सहारे जीना है,
कब तक यु छुप छुप के रोना है,
उम्र बीती जा रही है इंतजारे प्यार में,
कब तक युु तनहा जिंदगी जिया करेंगे ।
नीरव