।। मंजिल ।।
डरे कदम ,डरा मन
घुटी हुई आवाज,
सोचता है, विचरता है।
केवल कोरी कल्पना के
उड़ान में
टूटने का बिखरने का
पीछे रह जाने का भय
डराता है
मन डूबता,उतराया है
डाली का मोह छोडे बिना,
नही उडा जा सकता
सहम जाती है ख्वाहिशें,
शक्त हाथों से भी छूट जाती हैं ,
उंगलियां
न बेचैन होना ,न डरना,
अगर
पाना है गगन
भरनी होगी उड़ान,
मन पर करना होगा
विश्वास
नये संकल्प लें,
आगे बढ़े
और आगे
मंजिल की ओर.....
तारा गुप्ता