भावनाएं#
*******
ईश्वर की सुंदर और श्रेष्ठतम कृति
कवियों, चित्रकारों के कलमों की आकृति।
देवी के समान पूज्य,
माँ बहन बेटी पत्नी हर रूप में योग्य
फिर क्यों घर-बाहर हर कहीं बनती है सिर्फ भोग्य।
जन्म मिल जाए तो कहां जी पाती है
जीवन पाकर भी तिल - तिल करके जीती है
मार दी जाती है या वह स्वयं को खत्म कर देती है।
वह तो देती है जीवन को गति
फिर क्यों उसकी ऐसी दुर्गति।
संवेदना शून्य समाज मानसिक बीमारी से त्रस्त है
प्यार ममता बांटती खुद की झोली रिक्त है।
अब उसे अपने प्रति जागृत होना होगा
हिम्मत के साथ आगे बढ़ना होगा।
नहीं तो सृष्टि कैसे बचेगी
कैसे जीवन की रचना करेगी।
संसार अजन्मा ही रहेगा जब जननी ही नहीं रहेगी।
प्रेषिका
डॉ अमृता शुक्ला