प्रेम##
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ढंक लिया संसार अपना मैंने तुम्हारी बांह से।
जल उठे नैनों के दीपक प्यार की इस छांह से।
पंखुरी बन फूल की,
हंसनें लगे सपने मेरे।
बन के मेरी आंखों में,
नींद बन जगनें लगे।
डूबती गई स्नेह - जल में मिल न पाई थाह से।
जल उठे नैनो के दीपक प्यार की इस छांह से।
नाम सुनकर ही तुम्हारा,
चल उठे ठंडी पवन।
चेहरा देखकर बहार खिले,
खुश हो धरती - गगन।
जिस तरफ देखो नजा़रे भीगे तुम्हारी चाह से।
जल उठे नैनों के दीपक. प्यार की इस छांह से।
प्रेषिका
डॉ अमृता शुक्ला