इस साफसुथरे घर मे गन्दा कोना नही है,
जिसमे छुपा था बचपन वो घर मेरा नही है।
रातो को जगके छत पे गिरते तारो को खोजना,
पापा के साथ बैठे दुनिया को यू टटोलना,
वो छत के ऊपर दिख़ रहा वो आसमा नही है।
इतवार की सुबहा, कि मा को जो फरमाईशें,
साथ देखा टी.वी, रिमोट की लड़ाई से,
डांट खा कर भी दोहराना, वो खींचातानी नही है।
बिस्तर की चादर को सिलवटों से ही रख छोड़ना,
डांट रही मा को हस के मनाते मोड़ना,
रातको उसीकी गोद मे सिमट जाना, वो चेन नींद अब कहि नही है।
जिस खेल में सिकन्दर बने से तने चलना,
मा पापा को पूरे दिन की कहानीया करना,
दादी की एक कहानी ,कुछ कह रही नही है।
जब साथ बैठे किस्से करते यू रहते थे,
शेरलॉक की माफक दोस्त के काम आते थे
फिर खुलके उस गलती पे ठिठौली करते थे,
वो भूल जाने की अब गलतियां नही है।
साँसों में बस समुन्दर की हवाये लहराती थी,
कानो में मीठी घण्टियाँ मन्दिर की बह जाती थी,
हाथो में थोड़ी सी जो वो रेत रह जाती थी,
वो गीले पैरो के निशान अब मेरे नही है।
इस साफसुथरे घर में गन्दा कोना नही है,
जिसमे छुपा था बचपन वो घर मेरा नही है।
- परहेज(खुद)