#kavyotsav
ग़ज़ल (बाद-ए-सबा)
ना जाने कितने ही बीमार हुए.......इश्क़-ओ-वबा से,
उजड़ गया गुलिस्तां मेरा.........एक बाद-ए-सबा से,
तपिश-ए-दिल सोज़िश-ए-जां की कैफ़ियत ना पूछिए,
हम जल-जल के हुए है धुआं......सोज़िश-ए-निहाँ से,
जलते है शब-ओ-रोज़ हम....उस परवाने की मानिंद,
जलता है कोई परवाना जैसे............लौ-ए-शमा से,
कांटे जो बिछ गए हैं.........राह-ए-इश्क़ मे इस क़दर,
कोई क्या करे......कैसे करे.....सफ़र राह-ए-वफ़ा से,
हर सितम सय्याद के सह जाते है...हम ये ग़ुमान कर,
आएगा फ़ैसला मेरे हक़ मे कभी....दरबार-ए-ख़ुदा से,
कहते हो जफ़ा-ए-यार को.........हम कर दे दरगुज़र,
ये हौसला लाएं तो हम...............हम लाएं कहां से,
सहे है बा-अदब..ज़ुल्म-ओ-सितम ज़माने के यूं सभी,
उफ़ भी न कहा एक बार को.....कभी अपनी ज़बां से,
ज़ख़्म जिस्म के सारे एक बार को छुपा भी ले हम मगर,
ज़ख़्म रूह के छुपाए कहो.............किस ज़र्द क़बा से,
कहने को तो पहले भी ख़ास कुछ.......यारी न थी मगर,
नफ़रत मुकम्मल सी हो गई है मेरी अब अहल-ए-जंहा से,
अब कर जाएंगे हिजरत.......हम इस शहर-ए-ख़ुबाँ से,
दम घुटता है 'सादिक़.........यहां की आब-ओ-हवा से।
©Sadique