थोड़ा खो जाएं:
आज नन्हे बच्चों के स्कूल किडजी में जाना हुआ, अनायशा के स्कूल में। वरिष्ठ नागरिकों(दादा-दादी, नाना-नानी) के लिए तीन कार्यक्रम रखे गये थे। एक खेल में 12 गिलास थीं, उनके पीछे तले पर १,२,३ लिखे थे, गिलासों को तस्तरी में लगाना था और उनमें अपने अनुमान से एक, दो और तीन गोटियां डालनी थी।एक मिनट में यह करना था। फिर खेल कराने वाली महिला पता लगाती थी, किस गिलास में सही गोटियां डली हैं। जिसने सबसे अधिक सही गोटियां डाली होतीं, वह जीत जाता।
दूसरे खेल में एक से बीस तक गिनती बारी बारी से पढ़नी थी, लेकिन पाँच, दस, पंद्रह और बीस नहीं कहना था। बीस के बाद फिर एक से उसी क्रम में जल्दी-जल्दी बोलना था। जो पाँच, दस, पंद्रह और बीस बोल जाता था, वह आउट हो जाता था। अन्त तक जो रह जाता ,वह विजयी हो जाता था।
तीसरे खेल में संगीत बजता था और गेंद जल्दी-जल्दी अगले व्यक्ति को पास करनी थी, जहाँ पर संगीत बन्द होता था, उसे टोकरी से चिट निकालना था और उसमें लिखे गीत को गाना था, यदि गीत न आता हो तो अपने मन से कोई गीत या भजन गाना होता था। सभी ने पुराने गाने ही गाये या भजन। दो महिलाओं ने भजन गाया जिसका भाव था,' हे कृष्ण तुम पृथ्वी पर आना, राधा को साथ में लाना। हे राम तुम धरती पर आना, सीता जी को साथ में लाना।'
एक बुजुर्ग ने गाया,' पल-पल दिल के पास, तुम रहती हो--।' दूसरे ने,' याहू, चाहे तुम मुझे जंगली कहो---।' एक स्वर था,' ओ मेरी जोहर जबीं, तुझे मालूम नहीं---। दूसरा स्वर था,' रात बाकी , बात बाकी ---।'
मेरा पास जब गेंद रूकी तो मैं असमंजस में पड़ गया कि क्या गाया जाय। फिर मुझे याद दिलायी गयी और स्वर निकले,' हे, नील गगन के तले, धरती का प्यार पले,
ऐसे ही जग में आती हैं सुबहें, ऐसे ही शाम ढले---।'
फिर बगल से स्वर फूटा,' कभी, कभी मेरे दिल में ख्याल आता है---।' और ,' ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे---।' सब बहुत दूर निकल गये थे बचपन में।और कार्यक्रम का उद्देश्य भी यही था।
अन्त में चार साल की लड़की ने गाया,' आजकल तेरे-मेरे प्यार के चर्चे ,हर जबान पर---।' तो सभी बुजुर्ग ठहाका लगा कर हँसने लगे। इसके बाद ,राष्ट्रीय गान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
*** महेश रौतेला