कहा का न्याय?
शरीर भगवान का मंदिर है, कपडे कचरे का घर न की आप गंदकी करो, और अपनी भुख मीटा ने और मुह के ? स्वाद नहीं के लिए बिचारे अबोले जीव की हत्या कर के अपनी भुख मीटा के निदोँष का जीवन छीनो वो कहा का न्याय है?
हम धमँ के नाम लेके बिचारे निदोँष को मारे और धमँ का नाम दे हम दे और सुबह साम आरती पुजा और बंदगी करे वो कहा का न्याय ?
हम कोई दवा को बनाये तो पहले निदोँष जानवर पर करके हम गवँ लेते है, उनका भी परिवार होता है उनको अपने परीवार से अलग करे वो कहा का न्याय?
कोइ हवन होम हो या इद हो तो हम सबसे कोई निदोँष जीव की हत्या कर बोलते हैं भगवान मेरा अे भोग स्वीकार करें अे कहा का न्याय?
बिचारे निदोँष जीव की हम दुनिया और जींदगी उजाडकर भगवान या खुदा को हम मना ने चलते हैं वो कहा का न्याय ?