मध्यरात्रि… बौछारों से भीगा अस्तित्व… दौड़ते कदम… और... नवजात शिशु के बिलखने की आवाज़...
कदम रुके… देखा…
“कैसे लोग होते है दुनिया में….! अपने ही बच्चे के साथ ऐसा…?”
बच्चे को उठाया।
“संवेदन...?”
घबराकर कानों को धड़कन पे रखा। साँसों की सरगम सुनाई दी। और माथे पर नर्तन करते पाँव पड़े।
मटमैला मुख मृदा को नवनीत जैसे चाट मुस्कुरा रहा था। चमकीली आँखें देख रही थी।
तभी…
“मैं सामान्य आदमी…! ईस बालक को…! कैसे…?” विचार हुआ। और... कनिष्टिका पर नर्म स्पर्श…
हलका सा प्रकाश दिखा… आवाज़ आई…
मैं… ब्रह्म… कृष्ण… अनंत…
और… दरख़्त बकतर बन... उन्हें अपने रास्ते ले चला…
©नम्रता कंसारा