दरिया ए मौज़ हूं मैं, खुद से गुज़र जाने दे
जुस्तज़ू को तेरी, साहिल पर उतर जाने दे
क्या फ़लक क्या जमीं क्या आसरा चाहिए
जरूरतों को तेरी अब तुझसे मुकर जाने दे
जो नहीं है हौंसला कुछ कर गुज़र जाने का
तो थाम हसरतों को तेरी और सुधर जाने दे
इश्क के गुमान में गाफ़िल जीस्त मेरी,मुझे
रूसवाइयों को भूल सकूं अब उधर जाने दे
बेआबरू दौर को बचाये फिरूं किस तरह 'प्रांजलि'
पशेमां हैं रूह बेहद कि जिन्दगी मुकर जाने दे