मेरे देश की पहुँच
वेदों से उपनिषदों तक थी,
पुराणों से पुस्तकों तक थी।
सिन्धु से गंगा तक थी,
रामायण से महाभारत तक थी,
राम और कृष्ण तक थी।
तक्षशिला से नालंदा तक थी ,
हिमालय से हिमालय तक थी,
कालिदास से कबीर तक थी
शून्य से अंकों तक थी ।
इसी सच्च के बीच ,
इस भाषा से उस भाषा तक थी
मेरे देश की पहुँच
इस पार से उस पार तक थी ।
***महेश रौतेला