ये बारीस की तरह तु भी हमे तडपा रही है...
बरसो से छीपी प्यास फिर से तु जगा रही है....
कब आयेगी ये कोई नही जानता...
दिल मेरा अब नही मानता …...
तुम गर चाहो तो ना बरसो...
चाहो तो गरज गरज कर बरसो....
पर शायद एसा भी हो...
की तुम चाहो बरसना रात भर...
और हम ही ना हो ईस जहा में !!
फिर क्या तु रह पायेगी ईस तन्हाईमें ?
जी सके गी ये बेरहम दुनियामें बगैर मेरे ?
आसान है कीसी को अकेले छोड जाना...
मुश्किल है तन्हा जी पाना....
पर संभलना तु मेरे महबुब....
श्याम