उस मोड़ पे आके रुकी ये जिंदगी,
न किसीका हाथ मिला, न साथ,
अपने ही जख्मो को खुरदते देखे मेने कुछ लोग,
कुछ अपने थे कुछ पराये,
समज नहीं आ रही मुझे आज तक ये बेखुदी उनकी,
पास रहकर भी वो कितने दूर लग रहे हे,
बरसो से जल रही इस आग को,
कोई प्यासी नदी आकर बुजा दे,
में वो दरिया बन गया हु,
जिसकी गहराई कोई नहीं भाप पाया,
वो दिन बो राते अब सहमी सहमी सी लगती है,
उदास आँखों से ये सारा मंजर देखता हु,
कोई किनारा, कोई सहारा
बस मिल जाये,
हरदम यही सोचता हु ।
श्याम