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Renu Chaurasiya

Renu Chaurasiya

@renuchaurasiya.674847
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मेरा पहला प्यार
वो मेरे पड़ोस में रहने आया था। हाल ही में उसका ट्रांसफर हमारे शहर में हुआ था। वह अपने परिवार के साथ मेरे घर के बगल वाले मकान में रहने लगा। वह Manipur का था। उसे हिंदी नहीं आती थी और मुझे अंग्रेज़ी नहीं आती थी। शायद यही वजह थी कि हम कभी बात नहीं कर पाए।
फिर भी, न जाने क्यों उसके आसपास होने से मेरा दिल तेज धड़कने लगता था। जब भी वह मेरे पास से गुजरता, मेरी साँसें जैसे कुछ पल के लिए रुक जातीं। मैंने कभी उसे नमस्ते तक नहीं कहा, और न ही उसने कभी मुझसे बात की। लेकिन हमारी खामोशी में भी जैसे एक अनकहा रिश्ता था।
शाम होते ही मैं छत पर चली जाती, सिर्फ उसे देखने के लिए। कई बार वह सामने वाली बालकनी में खड़ा आसमान देख रहा होता। हमारी नजरें मिलतीं और फिर दोनों चुपचाप मुस्कुरा देते। उन छोटे-छोटे पलों में मुझे एक अजीब-सी खुशी मिलती थी। मुझे तो उसका नाम भी नहीं पता था ।पर क्या किसी को चाहने के लिए नाम की जरूरत होती है।
मुझे पता था कि शायद यह रिश्ता कभी पूरा नहीं होगा। न उसने अपने दिल की बात कही, न मैंने। फिर भी उसके लिए मेरे दिल में जो एहसास था, वह बहुत सच्चा था। और एक दिन वो चला गया।
आज वह मेरे पास नहीं है। शायद उसे कभी पता भी नहीं चला कि कोई उसे चुपचाप इतना पसंद करता था। लेकिन वह मेरा पहला प्यार था — एक तरफा, अधूरा, मगर बेहद

रेणु चौरसिया
- Renu Chaurasiya

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माँ की तस्वीर हर प्रोफ़ाइल पर लगाई है,
हर शब्द में उसकी ममता की दुहाई है।
सोशल मीडिया पर “माँ मेरी दुनिया” छाया है,
फिर वृद्धाश्रम में ये किसकी माँ आया है?
जिसने उंगली पकड़ चलना सिखलाया था,
खुद भूखी रहकर भी सबको खिलाया था।
जिस आंचल में पूरा बचपन सोया था,
आज वही आंचल तन्हाई में रोया था।
जिसने हर दर्द को हँसकर छुपाया था,
औलाद के सपनों को अपना बनाया था।
अब उसकी आँखों में बस इंतज़ार बाकी है,
दरवाज़े पर टिकती हुई एक नज़र बाकी है।
पोस्टों में माँ को देवी बताया जाता है,
पर घर में उसका कमरा खाली कराया जाता है।
कैसी ये दुनिया, कैसी ये रीत नई है,
ज़िंदा माँ बोझ और तस्वीर सबसे सही है।
माँ को शब्दों से नहीं, साथ से खुश रखो,
उसके बुढ़ापे को अपने हाथों से सुरक्षित रखो।
वरना एक दिन वक्त यही सवाल उठाएगा—
“सोशल मीडिया पर माँ छाई थी…
तो वृद्धाश्रम में फिर किसकी माँ आई थी

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तेरी यादों का बोझ लिए,
मैं खामोशी में जीती हूँ।
हँसने की कोशिश करती हूँ,
पर अंदर ही अंदर रोती हूँ।

बरसती बूंदों में ढूँढती हूँ तुझको,
पर तेरा कोई निशान नहीं मिलता।
दिल पुकारे हर पल तेरा नाम,
पर तू कहीं भी पास नहीं मिलता।

वो कसमे, वो वादे तेरे,
सब धुएँ बनकर उड़ गए।
जिस दिल को तूने अपना कहा,
आज उसी दिल के टुकड़े हो गए।

कभी तो लौटकर देखेगा तू,
इन भीगी आँखों की कहानी।
तेरे बिना जो टूट गया,
वो मेरा दिल था… मेरी ज़िंदगी नहीं।

बरसती बूंदों में ढूँढती हूँ तुझको,
पर तन्हाई ही अब साथी है।
जिसे चाहा था दिल से मैंने,
वो अब सिर्फ एक याद बाकी है…

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माँ अक्सर चुप रहती है,
पर उसकी खामोशी खाली नहीं होती…
उसमें छुपे होते हैं
हज़ार सवाल,
लाख दुआएँ,
और अनगिनत त्याग।
वो कम बोलती है,
पर हर आहट पहचान लेती है।
बच्चे की आँखों की नमी,
आवाज़ की थकान,
दिल की उलझन—
सब पढ़ लेती है बिना शब्दों के।
माँ की खामोशी
कभी शिकायत नहीं करती,
बस चुपचाप
अपने हिस्से के दर्द
आँचल में बाँध लेती है।
जब दुनिया शोर मचाती है,
माँ की चुप्पी ही
सबसे सुकून भरी आवाज़ बन जाती है…
क्योंकि उस खामोशी में
सिर्फ़ प्रेम होता है—
निस्वार्थ, असीम और सच्चा।

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🌺 नारी क्या है

नारी…
वो सृष्टि की प्रथम ध्वनि है,
वो जन्म की शुरुआत है,
जिसकी गोद में संसार ने साँस लेना सीखा।

वो कभी माँ बनकर ममता बरसाती है,
कभी बहन बनकर स्नेह लुटाती है,
कभी पत्नी बनकर अर्धांगिनी कहलाती है,
तो कभी बेटी बनकर घर का उजाला बन जाती है।

उसके आँचल में सुकून है,
उसकी आँखों में ब्रह्मांड का गहरापन।
वो मुस्कुराती है, तो लगता है जैसे सुबह खिल गई हो,
वो रोती है, तो लगता है जैसे बादल टूट पड़े हों।

नारी एक शक्ति है — जो सहती भी है, कहती भी है,
जो झुकती है तो प्रेम में, पर टूटती नहीं कभी अपमान में।
वो दीपक की लौ की तरह है —
छोटी सी होकर भी अंधकार को मिटा देती है।

वो केवल शरीर नहीं,
वो एक विचार है —
जो हर युग को नया अर्थ देती है।

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ज़िंदगी की राहों में कुछ अधूरी ख़्वाहिशें लिए चली हूँ मैं,

हर ख़्वाब की दहलीज से अपने सपने सींचती चली हूँ मैं।

कभी वक्त ने रुलाया, कभी हालात ने थकाया,

पर टूटी नहीं — बस चुपचाप मुस्कुराती चली हूँ मैं।

कुछ रिश्ते रास्तों में छूट गए, कुछ चेहरे धुंधले पड़ गए,

जो साथ थे कभी, अब बस याद बन के रह गए।

फिर भी उन यादों को दिल में समेटे,
थोड़ी टूटी, थोड़ी संभली सी — चली हूँ मैं।

अब शिकवे नहीं, अब शिकायतें भी नहीं,

बस एक सुकून है — कि मैंने हार मानी नहीं।

हर गिरावट से सीखा, हर दर्द से कुछ पाया,

ज़िंदगी से लड़ने का हुनर यूँ ही तो आया।

कभी आसमान को छूने की चाह, कभी ज़मीन की सादगी,

इन्हीं दो सिरों के बीच झूलती रही ये ज़िंदगी।

पर अब डर नहीं, न ग़म का कोई साया,

क्योंकि अब मैं जानती हूँ —

मंज़िल से ज़्यादा खूबसूरत होता है सफ़र,

और उसी सफ़र में…

खुद को ढूंढती हुई,अब भी चली हूँ मैं।

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दिन ढल जाता है,
पर मेरे भीतर की हलचल कभी नहीं ढलती।

लोग कहते हैं —
“तुम तो हँसती रहती हो,
इतनी खुशमिज़ाज हो…”
पर कोई नहीं जानता,
मेरी हँसी के पीछे कितनी बेचैनी छिपी है।

रात को जब सब सो जाते हैं,
मेरी आँखों से नींद भी रूठ जाती है।
दिल जैसे किसी का नाम पुकारता है,
पर होठों से आवाज़ नहीं निकलती।

कभी लगता,
काश कोई मेरे दिल की धड़कन सुन पाता,
तो समझ जाता
कि मैं कितनी उलझनों में कैद हूँ।

ये बेचैनी…
जैसे सीने में बंद कोई अनकही दास्तां हो,
जिसे कहने की हिम्मत
मैं हर रोज़ टाल देती हूँ।

मैं चाहती हूँ सुकून,
पर सुकून मुझसे दूर भागता है।
मैं चाहती हूँ कोई मेरा हाथ थामे,
और कहे —
“तुम अकेली नहीं हो।”

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काला कोहरा

मैं एक काला कोहरा हूँ,
न कोई आकार, न कोई रूप,

बस तैरता हुआ अंधेरा,
जो खुद भी अपने को समझ नहीं पाता।

मैं चमकता भी हूँ,
पर मेरी चमक डराती है,

लोग आते हैं मेरे पास
जैसे कोई रहस्य आकर्षित करता है,

फिर ठहरने से पहले ही लौट जाते हैं,
क्योंकि भीतर सिर्फ़ अंधेरा है।

मेरी आँखों से गिरते हैं
गहरे, काले आँसू,

जिन्हें कोई पढ़ नहीं पाता,
जिन्हें कोई समझ नहीं पाता।

कभी-कभी एक रूमाल आता है—
खूबसूरत, कोमल,

मेरे आँसू पोंछने की जिद करता है।
पर मैं उलझ जाता हूँ—

क्या यह सच्चा है,
या बस एक और दिखावा?

इसलिए मैं उसे
या तो दूर धकेल देता हूँ,

या खामोशी में
अपने ही कोहरे में खो जाता हूँ।

मैं एक काला कोहरा हूँ,
जिसकी चमक भी सवाल है,

और जिसका अंधेरा
खुद उसके दिल का जवाब।

चमकता हूँ पर अंधेरा हूँ,
आकर्षित करता हूँ पर खाली हूँ।

जो पास आते हैं, ठहरते नहीं,
और जो आँसू पोंछना चाहते हैं

उन पर भी यक़ीन नहीं।

"मैं चमकता हुआ अंधेरा हूँ,
जिसे कोई थामना नहीं चाहता।"

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ज़िंदगी का बोझ

कंधों पर बोझ रखा है,

पर कदमों में अब थकान है।

सपनों की किताबें कहीं छूट गईं,

बस ज़िम्मेदारियों का गुमान है।

चेहरे पर हँसी ओढ़ ली मैंने,

दिल में दर्द छुपा लिया।

हर रोज़ थोड़ा और टूटी मैं,

पर किसी से कुछ न कहा है।

कभी सोचा था उड़ूँगी खुली हवा में,

ख्व़ाबों की तरह खिलूँगी उजाला बनकर।

मगर अब तो सांसें भी भारी लगती हैं,

जैसे चल रही हूँ अंधेरा निगलकर।


हे ज़िंदगी, तू क्यों इतना कसती है?

क्यों हर रोज़ इम्तहान लेती है?

कभी तो आँचल में सुकून दे,

क्यों हर पल बस दर्द देती है

कंधों पर बोझ रखा है,

पर कदमों में अब जान नहीं है।

हाँ… थकी हू मैं,मगर टूटी नहीं,

दिल के किसीे कोने में अब भी पहचान है।


ज़िंदगी ने जकड़ा है मुझको,

इम्तिहानों से भरी है राहें।

मगर यकीन है,मुझे सुबह आएगी,

ये रात नहीं टिक पाएगी सदा के लिए।

थकान से झुकी है मेरी नज़र,

पर हिम्मत अब भी सीधी खड़ी है।

मैं गिरूँगी, उठूँगी, लड़ूँगी फिर,

क्योंकि मेरी मंज़िल मुझ स भीे बड़ी है।

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टूटा भरोसा

वो यूँ ही नहीं रोई थी,
आँखों में आँसू की नदियाँ तब बह निकलीं,
जब उसका भरोसा अपने ही तोड़ गए,
दिल के आईने को पत्थरों से तोड़ गए।

उसका जन्म उस घर में हुआ,
जहाँ परंपराओं की दीवारें ऊँची थीं,
जहाँ उसकी हँसी भी क़ैद थी,
और सपनों की परछाइयाँ भी दूजी थीं।

वो हर बार सहती रही,
सहनशीलता की चुप चादर ओढ़े रही,
पर जिस दिन अपने ही चेहरे बदल गए,
उसके भीतर के सारे दीपक बुझ गए।

रोना उसके लिए कमजोरी नहीं था,
वो उसके दिल की चीख थी,
एक टूटा हुआ विश्वास था,
जो आँसुओं की ज़बान बन गया।

अब वो रोकर और मज़बूत हो गई है,
उसके आँसू अब उसकी ताक़त हैं,
क्योंकि टूटकर ही इंसान सँवरता है,
और राख से ही नया जीवन निखरता है।

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