माँ अक्सर चुप रहती है,
पर उसकी खामोशी खाली नहीं होती…
उसमें छुपे होते हैं
हज़ार सवाल,
लाख दुआएँ,
और अनगिनत त्याग।
वो कम बोलती है,
पर हर आहट पहचान लेती है।
बच्चे की आँखों की नमी,
आवाज़ की थकान,
दिल की उलझन—
सब पढ़ लेती है बिना शब्दों के।
माँ की खामोशी
कभी शिकायत नहीं करती,
बस चुपचाप
अपने हिस्से के दर्द
आँचल में बाँध लेती है।
जब दुनिया शोर मचाती है,
माँ की चुप्पी ही
सबसे सुकून भरी आवाज़ बन जाती है…
क्योंकि उस खामोशी में
सिर्फ़ प्रेम होता है—
निस्वार्थ, असीम और सच्चा।