माँ की तस्वीर हर प्रोफ़ाइल पर लगाई है,
हर शब्द में उसकी ममता की दुहाई है।
सोशल मीडिया पर “माँ मेरी दुनिया” छाया है,
फिर वृद्धाश्रम में ये किसकी माँ आया है?
जिसने उंगली पकड़ चलना सिखलाया था,
खुद भूखी रहकर भी सबको खिलाया था।
जिस आंचल में पूरा बचपन सोया था,
आज वही आंचल तन्हाई में रोया था।
जिसने हर दर्द को हँसकर छुपाया था,
औलाद के सपनों को अपना बनाया था।
अब उसकी आँखों में बस इंतज़ार बाकी है,
दरवाज़े पर टिकती हुई एक नज़र बाकी है।
पोस्टों में माँ को देवी बताया जाता है,
पर घर में उसका कमरा खाली कराया जाता है।
कैसी ये दुनिया, कैसी ये रीत नई है,
ज़िंदा माँ बोझ और तस्वीर सबसे सही है।
माँ को शब्दों से नहीं, साथ से खुश रखो,
उसके बुढ़ापे को अपने हाथों से सुरक्षित रखो।
वरना एक दिन वक्त यही सवाल उठाएगा—
“सोशल मीडिया पर माँ छाई थी…
तो वृद्धाश्रम में फिर किसकी माँ आई थी