ज़िंदगी की राहों में कुछ अधूरी ख़्वाहिशें लिए चली हूँ मैं,
हर ख़्वाब की दहलीज से अपने सपने सींचती चली हूँ मैं।
कभी वक्त ने रुलाया, कभी हालात ने थकाया,
पर टूटी नहीं — बस चुपचाप मुस्कुराती चली हूँ मैं।
कुछ रिश्ते रास्तों में छूट गए, कुछ चेहरे धुंधले पड़ गए,
जो साथ थे कभी, अब बस याद बन के रह गए।
फिर भी उन यादों को दिल में समेटे,
थोड़ी टूटी, थोड़ी संभली सी — चली हूँ मैं।
अब शिकवे नहीं, अब शिकायतें भी नहीं,
बस एक सुकून है — कि मैंने हार मानी नहीं।
हर गिरावट से सीखा, हर दर्द से कुछ पाया,
ज़िंदगी से लड़ने का हुनर यूँ ही तो आया।
कभी आसमान को छूने की चाह, कभी ज़मीन की सादगी,
इन्हीं दो सिरों के बीच झूलती रही ये ज़िंदगी।
पर अब डर नहीं, न ग़म का कोई साया,
क्योंकि अब मैं जानती हूँ —
मंज़िल से ज़्यादा खूबसूरत होता है सफ़र,
और उसी सफ़र में…
खुद को ढूंढती हुई,अब भी चली हूँ मैं।