Garbh Sanskaar - 11 in Hindi Women Focused by Renu books and stories PDF | गर्भ-संस्कार - भाग 11

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गर्भ-संस्कार - भाग 11

प्राणायाम
प्राणायाम में महत्वपुर्ण इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाडी
मनुष्य की नाभि के पार्श्व में कुछ नीचे और ऊपर कुण्डलिनी का स्थान है। इस कुण्डलिनी के पार्श्व में नाभिकंद के बीच पंद्रह प्रमुख नाड़ियों का स्थान है।
१) सुषुम्ना, २) इडा, ३) पिंगला, ४) गांधारी, (५) हस्तजिह्वा ६) पूषा, (७) यशस्विनी ८) शूरा गन्ध ९) कुहू १०) सरस्वती ११) वारुणी १२) अलम्बुना, १३) विश्वोदरी, १४) शालिनी, १५) चित्रा

इन पंद्रह में से भी सुषुम्ना, इडा पिंगला– ये तीन प्रधान हैं (जिनका योग से घनिष्ठ सम्बन्ध है) इन तीनों में सुषुम्ना सर्वश्रेष्ठ है। इनमें सुषुम्ना नाड़ी समस्त शरीर को धारण करती है। यही मोक्ष मार्ग तक ले जाने वाली कही जाती है। यह नाडी अति सूक्ष्म नली के सदृश है, जो गुदा के निकट से मेरुदण्ड के भीतर होती हुई मस्तिष्क के ऊपर चली गयी है। इसी स्थान (गुदास्थान के निकट) से इसके वाम भाग से इडा और दक्षिण भाग से पिंगला नासिका-मुलपर्यन्त चली गयी है।

वहाँ भ्रूमध्य में ये तीनों नाडियाँ परस्पर मिल जाती हैं। सुषुम्ना को सरस्वती, इडा को गंगा और पिंगला को यमुना भी कहते हैं। गुदा के समीप जहाँ से ये तीनों नाडियाँ पृथक् होती हैं, उसको 'मुक्तत्रिवेणी' और भ्रूमध्य में जहाँ ये तीनों पुनः मिल गयी हैं, उसको युक्त -त्रिवेणी, त्रिवेणी संगम या प्रयाग क्षेत्र कहते हैं।

इड़ा— इसे चन्द्र नाड़ी भी कहते हैं। यह नाभिकंद में सुषुम्ना के बाईं ओर से आरंभ होकर बाएँ नासाछिद्र तक जाती है। यह शीत स्वर है। इडा तमः प्रधान है।

पिंगला— इसे सूर्य नाड़ी भी कहते है। यह नाभिकंद में सुषुम्ना नाडी के दाईं ओर से आरंभ होकर दाएं नासाछिद्र तक जाती है। यह उष्ण स्वर है। पिंगला रजः प्रधान है।

सुषुम्ना— सुषुम्ना नाड़ी कुण्डलिनी के मुख से आरंभ होकर मेरुदण्ड के मध्य से होती हुई मस्तिष्क के ऊपर स्थित सहस्त्रार चक्र तक जाती है। यह समशीतोष्ण स्वर पर अद्भुत ऊर्जा की क्षमता रखती है। साधारणतया प्राण-शक्ति निरन्तर इडा और पिंगला नाडियों व्दारा श्वास-प्रवाहित होती रहती है। श्वास कभी दायें नासिका से अधिक वेग से चलता है, कभी बायें से और कभी दोनों से समान गति से प्रवाहित होता है। जब बायें नासिका से श्वास अधिक वेग से चलता रहे तो उसे इडा या चन्द्र-स्वर कहते हैं। जब दायें से अधिक वेग से बहे तो उसे पिंगला व सूर्य स्वर कहते हैं एवं जब दोनो नासिकाओं से समान गति से अथवा एक क्षण एक नासिका से दूसरे क्षण दूसरे नासिका से प्रवाहित हो तो उसे सुषुम्ना स्वर कहते हैं। जिस प्रकार दिन और रात के मध्य में एक संधिकाल होता है, उसी प्रकार इडा पिंगला के बीच भी एक संधिकाल आता है। उस समय दोनों नासा छिद्रों से स्वर चलता है। इसे सुषुम्ना स्वर कहते हैं।

प्राणायाम में उपयोगी मुद्राऐं
ज्ञान मुद्रा : सुखासन में बैठकर हाथ की तर्जनी (अंगूठे के साथ वाली) उंगली के अग्रभाग (सिरे) को अंगूठे के अग्रभाग के साथ मिलाकर रखने और हल्का-सा दबाव देने पर ज्ञान मुद्रा बनती है, बाकी उंगलियां सहज रूप से सीधी रखें। यह मुद्रा किसी भी आसन एवं स्थिति में की जा सकती है।

लाभ : ज्ञान मुद्रा समस्त स्नायुमंडल को सशक्त बनाती है। यह विशेषकर मानसिक तनाव के कारण होने वाले दुष्प्रभावों को दूर करके मस्तिष्क के ज्ञान तन्तुओं को सबल करती है। इसके निरन्तर अभ्यास से मस्तिष्क के सभी रोग– पागलपन, चिडचिडापन, उत्तेजना, अस्थिरता, क्रोध, आलस्य, घबराहट, डिप्रेशन, व्याकुलता एवं भय आदि दूर हो जाते हैं। इससे मस्तिष्क शुद्ध और विकसित होता है। मन शांत हो जाता है। चेहरे पर अपूर्व प्रसन्नता झलकने लगती है। यह मुद्रा मानसिक एकाग्रता बढाने में भी सहायक है। ज्ञान मुद्रा विद्यार्थियों के लिए एक वरदान है। इसके नियमित अभ्यास से स्मरण शक्ति उन्नत और बुद्धि तेज होती है। ज्ञान मुद्रा अनिद्रा रोग में रामबाण है।

ध्यान मुद्रा: सुखासन में बैठकर बाएं हाथ की हथेली पर दाएं हाथ की हथेली को हल्के से रखने पर ध्यान मुद्रा बन जाती है। जो व्यक्ति पद्मासन नहीं कर सकते तो उन्हें सुखासन, स्वस्तिकासन अथवा सिद्धासन में ध्यान मुद्रा करनी चाहिए। यह सहज ध्यान मुद्रा है। इससे ध्यान के लाभ भी मिल जाते हैं।

बंध ध्यान मुद्रा: दोनो हाथों की उंगलियाँ आपस में बाँधकर हथेलियों झोली बना लें।

लाभ– रोजाना नियमपूर्वक ध्यान मुद्रा / बंध ध्यान मुद्रा करने से मानसिक शान्ति प्राप्त होती है और स्नायुमंडल को बल भी मिलता है। इस मुद्रा द्वारा मन की चंचलता समाप्त होकर एकाग्रता बढ जाती है। सात्विक विचारों की उत्पत्ति होती है और ध्यान, उपासना में मन लगता है। साधक को ध्यान की उच्चतर स्थिति में पहुंचने में मदद मिलती है। स्वयं और ईश्वर के साक्षात्कार में भी यह मुद्रा सहायक है।

अन्य मुद्राऐं भी उपयोग में ली जाती है, परंतु सामान्य अभ्यास के लिए यही प्रचलित मुद्राऐं है। इस कारण अन्य मुद्राओं की जानकारी यहाँ नही दे रहे है।

प्राणायाम की स्थिती तथा काल
किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठ जायें (सुखासन, वज्रासन )। रीढ की हड्डी सीधी होनी चाहिए। यदि आप किसी भी आसन में नहीं बैठ सकते तो कुर्सी पर भी सीधे बैठकर प्राणायाम कर सकते हैं, परन्तु रीढ की हड्डी को सीधा रखें। प्राणायाम करने से प्राणशक्ति का उत्थान होता है तथा मेरुदण्ड से जुडे हुए चक्रों का जागरण होता है। अतः प्राणायाम में सीधा बैठना अति आवश्यक है। बैठ कर प्राणायाम करने से मन का भी निग्रह होता है। आँखे बंद कर के प्राणायाम करने से ध्यानयुक्त प्राणायाम हो जाता है।

प्राणायाम के लिए शुध्द, सात्विक व निर्मल स्थान चुनें। बड़े शहरों में यह संभव न हो तो, स्वच्छ कमरे की खिड़की में तुलसी का पौधा रख दें। कोने में सुगंधित अगरबत्ती ऐसे लगा दें कि धुंआ आपके चेहरे पर ना आये। घी का दिया जला लें। विद्युत कुचालक आसन पर बैठ कर शांत व प्रसन्न मन से प्राणायाम करें।

यथा संभव ब्रम्हकाल या प्रातः काल शौचादि से निवृत्त हो कर संभवतः स्नान कर के प्राणायाम करें। प्राणायाम के उपरांत अगर आसन कर रहे हो तो उपरांत 25 मिनिट तक स्नान ना करें। शाम के समय प्राणायाम करना हो तो भोजन 3-4 घंटे पुर्व कर लें। किसी तरह मलमुत्र का अवरोध ना रहे।

प्राणायाम के उपरांत तुरंत ध्यान-उपासना, पुजा पाठ करें तो वे अधिक फलित होती है। प्राणायाम के पुर्व प्रार्थना, बीच या प्रार्थना के संग कम से कम 8 या 9 गायत्री मंत्र करें। साधना की समाप्ती में शांति पाठ करें।

प्राणायाम के उपरांत दिन भर के लिए कोई संकल्प लेना हो तो उस संकल्प को आँखे बंद कर के मन में 3-4 बार दोहरा दें। प्राणायाम के साथ ध्यान भी अपने आप होने लगता है। प्राणायाम से प्राप्त उर्जा दिन भर आपको लाभान्वित करती रहेगी। प्राणायाम केवल शरीर से संबंधित ही नही, मन से एवं आत्मा से जुडी साधना है। साधना से उठने के पूर्व आप आपके शरीर के चारों ओर निर्मित एक आभा मंडल (औरा मंडल) को संरक्षण चक्र के रुप में कल्पना कर सकते है। जिससे आपको बाहरी दुष्प्रभावों से सुरक्षा भी मिल सकेगी।

प्राणायाम के समय भावना
श्वास को अन्दर भरते हुए मन से विचार (संकल्प) करना चाहिए कि ब्रह्माण्ड में विद्यमान दिव्य शक्ति, ऊर्जा, पवित्रता, शान्ति और आनन्द आदि जो भी शुभ है, वह प्राण के साथ मेरे देह में प्रविष्ट हो रहा है। हम दिव्य शक्तियों से ओत-प्रोत हो रहे है। इस प्रकार दिव्य संकल्प के साथ किया हुआ प्राणायाम विशेष लाभप्रद होता है।

प्राणायाम की क्रियाओं को करते समय आँखों को बन्द रखें और मन में प्रत्येक श्वास के साथ 'ओ३म्' का मानसिक रूप से चिन्तन और मनन करना चाहिए।

प्राणायाम को करते समय मन में ऐसा विचार करना चाहिए कि जैसे ही हम श्वास को बाहर छोड़ रहे है, इस प्रश्वास के साथ मेरे शरीर के समस्त रोग बाहर निकल रहे हैं, नष्ट हो रहे हैं। जिसको जो शारीरिक रोग हो, उस दोष या विकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, राग, द्वेष आदि को बाहर छोड़ने की भावना करते हुए रेचक करना चाहिए। इस प्रकार रोग के नष्ट होने का विचार श्वास छोड़ते वक्त करने का भी विशेष लाभ होता है। इड़ा एवं पिंगला नाड़ियों में श्वास का घर्षण और मन्थन होने से सुषुम्ना नाड़ी जागृत हो रही है। मुलाधार चक्र से सहस्त्रार चक्र पर्यन्त एक दिव्य ज्योति का ऊर्ध्वस्फुरण हो रहा है। मेरा पूरा देह दिव्य आलोक से दैदीप्यमान हो रहा है। यह विचार करें कि विश्वनियन्ता परमेश्वर की दिव्यशक्ति, दिव्यज्ञान की वृष्टि चारों ओर से हो रही है। वह सर्वशक्ति मान् परमात्मा अपनी दिव्यशक्ति से मुझे ओतप्रोत कर रहा है।

प्राणायाम के लाभ तथा विशेषताऐं
मुख पर आभा, ओज, तेज एवं शान्ति, आध्यात्मिक शक्ति का विकास, प्राणायाम संग ध्यान की अनोखी प्रक्रियाओं द्वारा सौम्यता, शांति, स्थिरता व आनंद की अद्भुत प्राप्ति, आध्यात्मिक, धार्मिक व सामाजिक उन्नती, स्व-परिचय व ईश दर्शन, डिप्रेशन, नकारात्मकता, भय, क्रोध, आलस्य को निकालना तथा आत्मविश्वास, बुध्दीमत्ता, एकाग्रता, स्मरण शक्ति, सकारात्मकता बढना। स्थिर, शान्त, प्रसन्न तथा उत्साहित मन। काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार आदि दोष नष्ट होना। ध्यान में व समाधी में प्रविष्ट होने के लिए प्राणायाम उपयुक्त है। अष्टांग योग में सीधा प्रवेश प्राणायाम व्दारा किया जा सकता है।

वात, पित्त और कफ इन तीनों दोषों का शमन, पाचनतन्त्र स्वस्थता, उदर रोग से मुक्ति, हृदय, फेफड़े एवं मस्तिष्क-सम्बन्धी रोग से मुक्ति, मोटापा, मधुमेह, कॉलेस्ट्रोल, कब्ज, गैस, अम्लपित्त, श्वास रोग, एलर्जी, माइग्रेन, रक्तचाप, किडनी के रोग, आदि सामान्य रोग, कैन्सर सभी साध्य-असाध्य रोग से मुक्ति। रोग-प्रतिरोधक क्षमता का विकास। वंशानुगत रोगों से बचाव। बालों का झड़ना और सफेद होना, चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ना, नेत्रज्योति के विकार, स्मृति दौर्बल्य आदि से बचाव।

उपरोक्त लाभ सामान्य साधकों के लिए दिये गये हैं। गर्भवती माता को तो यह लागु होते ही है, परंतू गर्भवती माता जब प्राणायाम करती है, तब रोग व्याधियों की तरफ कम वह अपने तथा शिशु के लिए अधिक सोचती है।

शिशु को भी प्राणायाम का लाभ प्राप्त होता है। शिशु स्वस्थ, बुद्धीमान एवंम् शांत चित्त का होता है। आध्यात्मिक चेतना को शिशु ग्रहण कर लेता है। परम पिता परमात्मा एवंम् जगन्माता से शिशु को आशिर्वाद प्राप्त होता है। शिशु में अनुवांशिक रोगों की संभावनाऐं कम होती है। इन प्राणायामों के उपरांत जो ओंकार ध्यान तथा सामान्य ध्यान होता है, उस ध्यान के माध्यम से गर्भवती माता अपने गर्भस्थ शिशु संग संवाद स्थापित कर सकती है। गर्भ का ध्यान कर अंत:चक्षुओं से अपने गर्भस्थ शिशु को देख सकती है। अपनी भावनाओं के माध्यम से शिशु को संस्कारित कर सकती है।

स्वस्थ शिशु एवंम् सुलभ सहज प्रसुती में प्राणायाम सहायक साबित होते है। शिशु में कुछ कमी हो तो वह भी पुर्ण होने की संभावना रहती है। अतः प्राणायाम एवं ध्यान से गर्भवती माता को अनगिनत लाभ मिलते है। जिसको केवल शब्दो में नही आंका जा सकता, ना ही उन लाभों का अंदाजा लगाया जा सकता है।

अगर माता पिता दोनो गर्भाधान पुर्व से ही प्राणायाम एवं ध्यान करते हों, और वे गर्भावस्था में भी यह जारी रखें तो अद्भुत एवं दिव्य शिशु की संभावना बन जाती है। ऐसे शिशु का संकल्प करके भी पाया जा सकता है।

गर्भवती के लिए प्राणायाम जरुरी है, क्योंकि प्राणायाम से गर्भस्थ शिशु को आक्सीजन युक्त शुध्द रक्त मिलता है । शिशु संबंधित कोई समस्याएं गर्भ में हो तो प्राणायाम करके शिशु को उन समस्याओं से बचाया जा सकता है। प्राणायाम करने से बच्चो को वंशानुगत रोगों से भी मुक्त रखा जा सकता है । अवसाद व उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएँ भी प्राणायाम से दूर रहती है।

भस्त्रिका प्राणायाम
प्रक्रिया : दोनो नासिकाओं से श्वास को पूरा अन्दर तक भरना तथा बाहर सहजता से छोड़ना। इस प्राणायाम को ५ से १० मिनट तक करें।

इस प्राणायाम को तीन प्रकार से किया जा सकता है, मन्द गति से, मध्यम गति से, तीव्र गति से। गर्भवती को केवल मंद गति से ही भस्त्रिका प्राणायाम करने की अनुमति है।

अंत में जितना समय प्राणायाम किया, उतना ही समय ध्यान लगायें। ध्यान के समय श्वासों को अपने हाल पर छोड़ दें। ध्यान से बाहर आने के लिए एक ओंकार करें।

सावधानी: गर्भवती महिलाऐं केवल मंद गति से ही भस्त्रिका प्राणायाम करें। जब श्वास को अन्दर भरें, तब पेट को नहीं फुलाना चाहिए। श्वास डायाफ्राम तक भरें, इससे पेट नहीं फूलेगा, पसलियों तक छाती ही फूलेगी। ग्रीष्म ऋतु में अल्प मात्रा में करें।

लाभ: सर्दी-जुकाम, एलर्जी, श्वासरोग, दमा, पुराना नजला, साइनस आदि समस्त कफ रोग, थॉयरायड एवं टॉन्सिल आदि गले के समस्त रोग दूर होते हैं। फेफड़े सबल बनते हैं तथा हृदय और मस्तिष्क को भी शुद्ध प्राणवायु मिलने से आरोग्य लाभ होता है। 

प्राण और मन स्थिर होते हैं। गर्भस्थ शिशु को भी प्राणायाम का लाभ प्राप्त होता है। शिशु स्वस्थ होता है। शिशु में अनुवांशिक रोगों की संभावनाएं कम होती है।

अनुलोम-विलोम प्राणायाम:
प्रक्रिया: अनुलोम-विलोम प्राणायाम को बाई (इड़ा, चन्द्र स्वर-शीत) नासिका से प्रारम्भ करते हैं। अंगुठे से दाहिनी नासिका को बन्द करके बाईं नाक से श्वास धीरे-धीरे अन्दर भरना चाहिए। श्वास पूरा अन्दर भरने पर, अनामिका एवं मध्यमा से वाम स्वर को बन्द करके दाहिने (पिंगला–सुर्य स्वर-उष्ण) नाक से पूरा श्वास बाहर छोड़ देना चाहिए। यही प्रक्रिया दुसरी नासिका से करें, अर्थात् बाईं नासिका से श्वास लेकर, दाएँ से बाहर छोड़ देना, फिर दाएँ से लेकर बाईं ओर से श्वास को बाहर छोड़ देना। सामान्यतः ३ से ४ सेकेंड का एक पुरक एवं रेचक होता है। थकान होने पर बीच में थोड़ा विश्राम कर लें। इस प्राणायाम को तीन मिनट से प्रारम्भ करके दस मिनट तक किया जा सकता है।

सावधानी: अधिकतम समय १० मिनट का है। इससे अधिक इस प्राणायाम को न करें।

लाभ : इस प्राणायाम से ७२ करोड़, ७२ लाख, १० हजार दो सौ दस नाड़ियाँ परिशुद्ध हो जाती हैं। सम्पूर्ण नाड़ियों की शुद्धि होने से देह पूर्ण स्वस्थ, कान्तिमय एवं बलिष्ठ बनता है। सन्धिवात, आमवात, गठिया, कम्पवात, स्नायु दुर्बलता आदि समस्त वातरोग, मूत्ररोग, धातुरोग, शुक्रक्षय, अम्लपित्त, शीतपित्त आदि समस्त पित्त रोग, सर्दी, जुकाम, पुराना नजला, साइनस, अस्थमा, खाँसी, टॉन्सिल आदि समस्त कफ रोग दूर होते हैं। त्रिदोष का प्रशमन होता है। हृदय की शिराओं में आये हुए अवरोध (ब्लॉकेज ) खुल जाते हैं। कॉलेस्ट्रोल, ट्राइग्लिसराइड्स, एच.डी.एल. आदि की अनियमितताएँ दूर हो जाती हैं।

नकारात्मक चिन्तन में परिवर्तन होकर सकारात्मक विचार बढने लगते हैं। आनन्द, उत्साह एवं निर्भयता की प्राप्ति होने लगती है। माँ की प्रसन्नता का लाभ गर्भस्थ शिशु को भी प्राप्त होता है। शिशु स्वस्थ होता है। शिशु में अनुवांशिक रोगों की संभावनाएं कम होती है।

उज्जायी प्राणायाम:
प्रकार १ — सरल उज्जायी : वज्रासन / सुखासन में बैठकर कमर पर हाथ रख नाभि से कंठ और कंठ से नाभि, इस प्रकार ध्यानपूर्वक घर्षणयुक्त पूरक-रेचक करना चाहिए। (४ बार )

प्रकार २ — मध्य उज्जायी : बगल में अंगुठे और छाती पर उंगलियाँ मिलाते हुए हाथ रख, उसी प्रकार सांस को भरना और रेचक करना चाहिए। (४बार)

प्रकार ३ — ऊर्ध्व उज्जायी : दोनों हाथ अपने कानों को छुते हुए, कोहनियाँ आसमान की ओर कर, पंजे पीठ पीछे लगा दें। इस स्थिती में घर्षणयुक्त पुरक रेचक करें। (४बार)

प्रकार ४— प्राणायाम : इस प्राणायाम में पूरक करते हुए गले को सिकोड़ते हैं और जब गले को सिकोड़कर श्वास अन्दर भरते है। तब जैसे खर्राटे लेते समय गले से आवाज होती है, वैसे ही इसमें पूरक करते हुए कण्ठ से ध्वनि होती है। ध्यानात्मक आसन में बैठकर दोनों नासिकाओं से हवा अन्दर खींचिए। कण्ठ को थोडा संकुचित करने से हवा का स्पर्श गले में अनुभव होगा। हवा का घर्षण नाक में नहीं होना चाहिए। कण्ठ में घर्षण होने से एक ध्वनि उत्पन्न होगी। इस प्राणायाम में सदैव दाई (पिंगला – सुर्य स्वर – उष्ण ) नासिका को बन्द करके बाई ( इड़ा, चन्द्र स्वर-शीत ) नासिका से ही रेचक करना चाहिए। (८बार)

१) लाभ : जो साल भर सर्दी, खाँसी, जुकाम से पीडित रहते हैं, जिनको टॉन्सिल, थॉयरायड ग्लैण्डख, अनिद्रा, मानसिक तनाव और रक्तचाप, अजीर्ण, आमवात, जलोदर, क्षय, ज्वर, प्लीहा आदि रोग हों, उनके लिए यह लाभप्रद है। गले को ठीक, निरोग एवं मधुर बनाने हेतु इसका नियमित अभ्यास करना चाहिए। कफदोष, कंठ-विकार, हृदय की तीव्र धडकन, घबराहट आदि दूर होकर प्राणवायु को ज्यादा मात्रा में लेने का सामर्थ्य बढ़ता है और फेफड़ों की ताकत बढ़ती है।

सूचना: उज्जायी की सभी क्रियाएँ मौसम तथा गर्भवती की शारीरिक अवस्था को ध्यान में रखकर ही होनी चाहिए। ऊपरी क्रियाएँ करते समय अगर उष्णता का प्रमाण बढा, तो प्रकृति की समानता के लिए नीचे दिए हुए शीतलीकरण के प्रयोग भी कर लें। ये क्रियाएँ है, शीत्कारी, शीतली और वायुसार।

शीत्कारी : दांतों की दोनों पंक्तियाँ बन्द करके, मुँह के द्वारा बाहरी हवा को अन्दर खींचिए और मुँह बंद करके नासिका से रेचक करें।

शीतली : कौवे की चोंच की भान्ति अपनी जीभ को गोल बनाकर, होठों से बाहर निकालकर, उसी के द्वारा बाहरी हवा को जीभ, कण्ठ के द्वारा अन्दर खींचिए और मुँह बंद करके दोनों नासिका से रेचक करें। पाँच से दस बार करें।

वायुसार : फूंक मारते समय जैसे होठों को गोल किया जाता है, उसी प्रकार सूं सूं की आवाज करके बाहरी हवा को अन्दर खींचिए और उसे निगलकर नाक से धीरे-धीरे रेचक करें। यह भी पाँच-दस बार करें। इससे वायु प्रकोप शांत किया जाता है। अप्राकृतिक डकारों को कम किया जाता है। कालान्तर से गर्मी से निर्माण होने वाले सभी दोषों का निर्मूलन होता हैं।

शीतली प्राणायाम
शीतली प्राणायाम : ध्यानात्मक आसन में बैठकर हाथ घुटनों पर रखें। जिह्वा को नलीनुमा मोड़ कर मुँह खुला रखते हुए मुँह से पूरक करें। जिह्वा से धीरे-धीरे श्वास लेकर फेफड़ों को पूरा भरें। कुछ क्षण रोक कर मूँह को बन्द करके दोनों नासिकाओं से रेचक करें। ततपश्चात् पुन:जिह्वा मोड़कर मुँह से पूरक एवं नाक से रेचक करें। इस तरह ८ से १० बार करें।

सावधानी: शीतकाल में इसका अभ्यास कम करें। कफ प्रकृति वाले एवं टॉन्सिल के रोगियों को शीतली प्राणायाम नहीं करना चाहिए।

लाभ: जिह्वा, मुँह एवं गले के रोगों में लाभप्रद है। गुल्म, प्लीहा, ज्वर, अजीर्ण आदि ठीक होते हैं। इसकी सिद्धि से भूख-प्यास पर विजय प्राप्त होती है। उच्च रक्तचाप को कम करता है। पित्त के रोगों में लाभप्रद है, रक्त शोधन भी करता है।

शीत्कारी प्राणायाम
शीत्कारी प्राणायाम : ध्यानात्मक आसन में बैठकर जिह्वा को ऊपर तालू में लगाकर ऊपर-नीचे की दन्त पंक्ति को एकदम सटाकर होठों को खोलकर रखें। अब धीरे-धीरे 'सी-सी', की आवाज करते हुए मुँह से श्वास खींचे और फेफड़ो को पूरी तरह भर लें। फिर मुँह बन्द कर नाक से धीरे-धीरे रेचक करें। पुनः इसी तरह दुहरायें। इसका ८-१० बार का अभ्यास पर्याप्त है।

सावधानी: शीतकाल में इसका अभ्यास कम करें। कफ प्रकृति वाले एवं टॉन्सिल के रोगियों को शीत्कारी प्राणायाम नहीं करना चाहिए। पूरक के समय दाँत एवं जिह्वा अपने स्थान पर स्थिर रहनी चाहिए।

लाभ : लाभ शीतली प्राणायाम की तरह हैं। दन्तरोग, पायरिया आदि के अतिरिक्त गले, मुँह, नाक जिह्वा के रोग भी दूर होते हैं। निद्रा कम होती है और शरीर शीतल रहता है। उच्च रक्तचाप में लाभ होता है।

प्राणायाम, ध्यान व अन्य साधनाएँ करते समय सुमधूर शांत संगीत, ओंकार धुन, कृष्ण संकीर्तन धुन, या ध्यान संगीत लगायें तो प्राणायाम का लाभ व आनंद दोनो बढेंगे। आध्यात्मिक भजन भी सुन सकते हो।

प्राणायाम करते समय ध्यान साध्य करने का प्रयत्न करने वाली माँ अपने व शिशु के लिए स्वास्थ्य प्राप्त करती है, साथ ही साथ विचारों पर नियंत्रण करते हुए संयम व शांति का संस्कार भी कर देती है। इसके लिए प्राणायाम ध्यानस्थ स्थिती में करना लाभदायक है।

भ्रामरी प्रणव प्राणायाम
सुखासन में बैठे। अंगुठो व्दारा दोनो कानों को बंद कर लें। अंगुठे के बाद की अनामिका अंगुली माथे पर ले जाये, बची तीन अंगुलियाँ आँखो पर हलके से रख दें, दबायें नहीं। अब गहरा पुरक (सांस भरना) करें। रेचक ( सांस छोडना ) के रुप में दीर्घ भ्रमर का गुंजन करें। गुँजन में ओम की गुनगुनाहट रहे। इस तरह ५ गुँजन करने के उपरांत अपने हाथ ध्यान-ज्ञान मुद्रा में ले आयें। पुरक का क्रम जारी रखे एवंम् अब गुँजन की जगह ओंकार का उच्चारण करते जाये। पाँच भ्रमर गुँजन के जवाब में नौ ओंकार करें। नौ ओंकार होने के उपरांत अपना ध्यान भीतर ही रखे। ओंकार की अत:र्ध्वनी सुनते रहे। दृष्टा बनकर दीर्घ व सुक्ष्म गति से श्वास को लेते व छोड़ते रहे। श्वासों की गति इतनी सुक्ष्म रहनी चाहिये कि श्वासों की ध्वनी की अनुभुती न हो। जितना समय आपने उपरोक्त क्रिया की, उतना या अपनी इच्छानुरूप अधिक समय आप ध्यान कर सकते हैं। ध्यान समापन के बाद पुनः एक ओंकार का उच्चारण करें। हाथों का घर्षण करें चेहरे पर अच्छे से घुमा लें, भुमि की तरफ देखते हुए अपनी आँखे खोलें। मन ही मन परमात्मा को प्राप्त शांति व प्रेम के लिए धन्यवाद दें।

सावधानी : यह प्राणायाम अपनी चेतना एकाग्र करते हुए करना चाहिए। भगवान् की करुणा, शान्ति तथा आनन्द बरस रहा है। इस प्रकार शुद्ध भाव से यह प्राणायाम करने से एक दिव्य ज्योति पुंज आज्ञाचक्र में प्रकट होता है और ध्यान स्वतः होने लगता है।

लाभ : मन की चंचलता दूर होती है। मानसिक तनाव, उत्तेजना, उच्च रक्तचाप, हृदयरोग आदि में लाभप्रद है। ध्यान के लिए अति उपयोगी है।

पूर्व के सभी प्राणायामों की तरह शिशु को इस प्राणायाम का भी संपुर्ण लाभ प्राप्त होता है। शिशु स्वस्थ, बुद्धीमान एवंम् शांतचित्त का होता है। आध्यात्मिक चेतना को शिशु ग्रहण कर लेता है। परम पिता परमात्मा एवंम् जगन्माता से शिशु को आशिर्वाद प्राप्त होता है। शिशु में अनुवांशिक रोगों की संभावनाऐं कम या खत्म हो जाती है।

इस प्राणायाम के उपरांत जो ओंकार ध्यान होता है, उस ध्यान के माध्यम से गर्भवती माता अपने गर्भस्थ शिशु संग संवाद स्थापित कर सकती है। गर्भ का ध्यान कर अंत:चक्षुओं से अपने गर्भस्थ शिशु को देख सकती है। अपनी भावनाओं के माध्यम से शिशु को संस्कारित कर सकती है।

इस प्राणायाम को हमें आगे ओंकार ध्यान के साथ विस्तृत करना है।

गर्भवती माँ की साधना सुर्योदय से पूर्व हो जाये तो कई अतिरिक्त लाभ हो जाते है। ब्रम्हमहुर्त में तो और अत्यधिक लाभ हो जाते हैं। ब्रम्हमहुर्त में रोज ना उठ पाओ तो कम से कम १५ दिन में १ बार उठकर साधना करनी चाहिए। सुर्योदय से पूर्व रोजाना की साधना करना शिशु के दृष्टिकोन से अत्यंत महत्वपुर्ण है। सुबह एवं रात को सोते न्युज पेपर व न्युज चॅनल पढना-देखना टाल दें। सुबह टीवी पर आध्यात्मिक धार्मिक चॅनल देखें। भोजन करते समय टीवी ना देखें, ना ही न्युज पेपर पढें। सुबह उठने के बाद आईने में अपना चेहरा देखकर मुस्कुराऐं। अपने आप को मन ही मन “जय श्री कृष्ण” कह कर अभिवादन करें। बाद में पुजा घर के सामने हाथ जोड़ें। घर में सभी सदस्यों को "जयश्री कृष्ण" करें।

विशेष आवश्यकता हो तो निम्नलिखित प्राणायाम करे।
चन्द्रभेदी प्राणायाम
(कुंभक रहित चन्द्रभेदी प्राणायाम) इस प्राणायाम में बाईं नासिका से पूरक करके, दाई नाक से रेचक करें। इसमें हमेशा चन्द्रस्वर से पूरक एवं सूर्यस्वर से रेचक करते हैं। पुनः पुनः इसे दो से पाँच मिनट तक करें। सूर्यभेदी से ठीक विपरीत है।

सावधानी: शीतकाल में इसका अभ्यास कम करना चाहिए। गर्भवती माता सलाह लिये बगैर ना करे। 

लाभ : शरीर में शीतलता आने से थकावट एवं उष्णता दूर होती है। मन की उत्तेजनाओं को शान्त करता है। पित्त के कारण होने वाली जलन में लाभदायक है। उच्च रक्तचाप में लाभकारी है।

सूर्यभेदी प्राणायाम
(कुंभक रहित सुर्यभेदी प्राणायाम) ध्यानासन में बैठकर दाईं नासिका से पूरक करके बाईं नासिका से रेचक करें। पुनः पुनः इसे दो से पाँच मिनट तक करें। प्राणायाम के समय सूर्य के तेज का ध्यान कर सकते है।

सावधानी: ग्रीष्म ऋतु में यह प्राणायाम ना करें। गर्भवती माता सलाह लिये बगैर ना करे। ऐसे भी इस प्राणायाम की गर्भवती को बहुत कम जरुरत होती है।

लाभ : शरीर में उष्णता तथा पित्त की वृद्धि होती है। वात और कफ से उत्पन्न होने वाले रोग, रक्त एवं त्वचा के दोष, उदर-कृमि, कोढ, छूत के रोग, अजीर्ण, अपचन, स्त्री रोग आदि में लाभदायक है। अनुलोम-विलोम के बाद थोड़ी मात्रा में इस प्राणायाम को करना चाहिए।